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प्रेरणा: देवांशी ने तोड़ी डाउन सिंड्रोम को लेकर धारणाएं, नागपुर से निकलकर अमेरिका तक बनाई पहचान

Mon, 11 Jul 2022 05:03 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली।

सार

डाउन सिंड्रोम नाम सुनते ही शारीरिक-मानसिक तौर पर अक्षम लोगों का ख्याल आता है और मन में हमदर्दी की भावना जागती है। हालांकि, इन्हीं के बीच देश में 28 वर्षीय देवांशी जोशी के रूप में एक ऐसा नाम भी है, जिन्होंने इस बीमारी को लेकर परंपरागत धारणाएं तोड़ी हैं। इसे कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बना लिया। लोगों से हमदर्दी नहीं, बल्कि उनका सहयोग चाहा, ताकि वह एक आम इंसान की तरह अपना मुकाम बना पाएं...और यह उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बखूबी हासिल किया। आज उनकी कहानी, उन्हीं की जुबानी...
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देवांशी जोशी। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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मेरा नाम है, देवांशी जोशी। नागपुर में पैदा हुई थी। जन्म हुआ तो शुरुआती जांच के बाद माता-पिता को पता लगा कि उनके घर एक ‘विशेष’ बच्ची आई है। स्वाभाविक ही उन्हें घबराहट हुई पर पिता ने डॉक्टरों से बात कर समझा कि डाउन सिंड्रोम आखिर है क्या। इसके बाद दोनों ने ठाना कि वे मुझे भी सामान्य बच्चों की तरह ही पालेंगे। नागपुर में प्राथमिक स्कूल में दाखिला दिलाया, पर मैं कक्षाओं के बाहर भागती रहती थी।

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जब बच्चे छेड़ते तो गुस्सा होकर उन पर थूक देती थी। मां और पापा चिंतित रहते थे कि कहीं स्कूल मुझे बाहर न कर दे। फिर मां ने खुद स्कूल में मेरे साथ जाना शुरू किया। घर पर ही मुझे कक्षा के पहले ही पढ़ाई कराई। फिर दिक्कत परीक्षाओं को लेकर आने लगी। मां चाहती थीं कि मैं खुद लिखूं। शुरुआती परीक्षा में वे मेरे साथ परीक्षा कक्ष में जाकर सवाल समझातीं और मैं उत्तर लिखती।

फैशन को बनाया पेशा
फैशन में मेरी दिलचस्पी देखकर मां-पापा ने इसमें मेरे लिए काम का अवसर तलाशा। इसकी शुरुआत 2013 में ‘ग्राम भारत’ संस्था के साथ हुई। फिर 2019 में एक बड़े रिटेल ब्रांड ने कई राउंड साक्षात्कार में चयन कर मुझे फैशन स्टोर में कर्मचारी बनाया। मेरे चयन से कंपनी को भरोसा बंधा और 40 मानसिक अक्षम बच्चों को भर्ती किया। अब आठ वर्षों से मैं कामकाजी हूं और तीन साल से फैशन रिटेल में अपनी भूमिका निभा रही हूं।
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यूएन में रखे विचार, मिला हेलन केलर अवार्ड
निर्वाचन आयोग के कहने पर अक्षम नागरिकों को मतदान के लिए जागरूक किया। सरकार से दो बार सम्मान मिला और हेलन केलर अवॉर्ड भी जीता। संयुक्त राष्ट्र में भी अपने विचार रखे। हाल ही में मैं अमेरिका में मोबिलिटी इंटरनेशनल के वूमंस इंस्टीट्यूट ऑन लीडरशिप एंड डिसेबिलिटी (वाइल्ड) में तीन हफ्तों के प्रशिक्षण से लौटी हूं। वाइल्ड में आमंत्रित मैं पहली भारतीय अक्षम महिला थी, जहां मैंने समाज में डाउन सिंड्रोम से गुजरने वाले लोगों को आगे लाने का प्रशिक्षण लिया।

'रेजिंग द बार' फिल्म में निभाई भूमिका
वर्ष 2015 में चेन्नई में डाउन सिंड्रोम के एक वैश्विक सम्मेलन में मुझे की-नोट संबोधन के लिए बुलाया गया। मेरे प्रेजेंटेशन को देखकर वहां ऑस्ट्रेलिया से आए कुछ लोगों ने मुझे ‘रेजिंग द बार’ डॉक्यूमेंट्री के लिए चुना।

सहयोग किया, पर निर्भर नहीं रखा
हमेशा कोशिश रही कि देवांशी अपने पैरों पर खड़ी होकर एक स्वतंत्र महिला बने। हमने उसे सहयोग जरूर किया, लेकिन हम पर ही निर्भर नहीं रहने दिया। -रश्मि जोशी, मां

मुकाम पाने का है जुनून
देवांशी में नए कौशल सीखने का माद्दा उसे अलग बनाता है और उसमें एक मुकाम पाने का जुनून है। मैं उसके भविष्य के बारे में आश्वस्त और खुश हूं। -अनिल जोशी, पिता

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