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पड़ताल: 2009 से ही दिए जा रहे डिटेंशन सेंटर बनाने के निर्देश, सुप्रीम कोर्ट भी वाकिफ

Thu, 26 Dec 2019 09:33 PM IST
अमित मंडल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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डिटेंशन सेंटर - फोटो : ANI
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डिटेंशन सेंटर पर छिड़ा विवाद अब सियासी रूप ले चुका है। इसे सीधे तौर पर एनआरसी से जुड़ा बताया जा रहा है। सियासी दलों के बीच इसे लेकर आरोप-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया है। आज राहुल गांधी के पीएम नरेंद्र मोदी पर वार के बाद भाजपा ने उनपर पलटवार करते हुए उन्हें झूठों का सरदार बता दिया। हकीकत ये है कि 2009 में गृह मंत्रालय की ओर से इन्हें बनाने के निर्देश जारी किए गए थे।

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वहीं, 22 दिसंबर को दिल्ली में हुई रैली में पीएम मोदी ने कहा था कि हिरासत केंद्रों की अफवाह कांग्रेस और अर्बन नक्सली ने फैलाई है। इस देश के मुसलमानों को न हिरासत केंद्रों में भेजा जाएगा और न ही भारत में कोई हिरासत केंद्र है। यह एक सफेद झूठ है। पीएम मोदी के इसी बयान पर हंगामा मचा है। 

बहरहाल, सियासी संग्राम के बीच समझने की कोशिश करते हैं कि देश में डिटेंशन सेंटर कब से बनने शुरू हुए और कहां कहां इन्हें बनाया गया है। 

डिटेंशन सेंटर का विस्तृत मैन्युल हुआ था जारी

लोकसभा में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, गृह मंत्रालय ने 2009 में ही राज्य सरकारों को अपने यहां डिटेंशन सेंटर बनने का निर्देश दिए थे। इसका मकसद यह था कि अवैध विदेशियों की किसी भी वक्त तुरंत स्वदेश रवाना किया जा सके। बता दें कि तब देश में कांग्रेस नीत यूपीए की सरकार थी।
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दो जुलाई 2019 को गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने सदन में कहा था कि इस तरह के निर्देश राज्यों और केंद्रशासित प्रदशों को 2009, 2012, 2014 और 2018 में दिए गए थे। राय ने ये भी बताया था कि 9 जनवरी 2019 को सभी राज्यों को मॉडल डिटेंशन सेंटर का विस्तृत मैन्युल जारी किए गए थे।

20 सितंबर 2018 को सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी जिसमें असम में बनाए गए छह हिरासत केंद्रों में रखे गए लोगों के परिजनों के हालात बयां किए गए थे। विदेशी घोषित नागरिकों को परिवारों से अलग रखा  इसके बाद 11 पेज का मैन्युल जारी हुआ था। 

अदालत में इस मुद्दे पर बहस हुई थी कि राज्य सरकार जेल और डिटेंशन सेंटर में किसी तरह का अंतर नहीं करती है और इसलिए असम जेल मैन्युल के मुताबिक ही कैंप चलाए जा रहे हैं। अदालत में बहस के दौरान 5 नवंबर 2018 को गृह मंत्रालय ने कहा था कि देशभर के डिटेंशन सेंटर में रखे गए विदेशियों को लेकर जल्द ही गाइडलाइन बनाई जाएगी। इसके बाद ही तमाम राज्यों को मैन्युल जारी किए गए थे। 

क्या कहता है मैन्युल?

मैन्युल के 39 बिंदुओं में कहा गया था कि डिटेंशन सेंटर या कैंप बनाने के लिए राज्यों को गृह मंत्रालय से अनुमति की जरूरत नहीं है। इसमें कहा गया था कि डिटेंशन सेंटर जेल से बाहर बनाए जाएं और इनकी संख्या और आकार अवैध विदेशियों की संख्या और उन्हें स्वदेश भेजे जाने के अनुपात को देखते हुए तय की जाए। 

असम में इस समय छह डिटेंशन सेंटर हैं जो कि किसी अन्य राज्य के मुकाबले सबसे ज्यादा है। एनआरसी प्रकाशित होने के बाद 10 और बनाए जाने हैं। 31 अगस्त 2019 को जारी हुए एनआरसी में 19 लाख लोगों के नाम हैं और 3.29 करोड़ लोगों ने इसके लिए आवेदन किया था। जो लिस्ट से बाहर हैं उनके पास फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल और अदालत जाने का रास्ता है। 

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सुप्रीम कोर्ट से संज्ञान में बने डिटेंशन सेंटर 

बहरहाल, देश में बने डिटेंशन सेंटर कानून के हिसाब से और सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान से बाद ही बनाए गए हैं। ये सेंटर कई राज्यों में पिछले कुछ दशकों से काम रहे हैं और इनका राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) से कोई संबंध नहीं है। सूत्रों ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी देते हुए बताया कि इन सेंटरों पर विदेशी नागरिकों को उनके वास्तविक देश का पता लगने और संबंधित सरकारों के यात्रा दस्तावेज जारी होने जैसे कामों के पूरा होने तक रोक कर रखा जाता है।

गृह मंत्रालय के अनुसार डिटेंशन सेंटर का मकसद उस व्यक्ति के यात्रा दस्तावेज तैयार होने तक उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिहाज से बने होते हैं ताकि सही वक्त पर वे भारत से बाहर जा सकें। मंत्रालय नेे इससे संबंधित निर्देश सुप्रीम कोर्ट के 28 फरवरी 2012 के एक आदेश के अनुपालन में दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट के 20 फरवरी, 2018 को दिए आदेश के अनुरूप आदर्श डिटेंशन सेंटर मैन्युल तैयार किया गया और फिर इसे गृह मंत्रालय ने नौ जनवरी, 2019 को सभी राज्यों को भेजा। कोर्ट ने गौर किया था कि सजा पूरी करने वाले विदेशी नागरिकों कों तुरंत जेल से रिहा करना चाहिए और उनके निर्वासन या वापस भेजे जाने तक सीमित आवाजाही के साथ ऐसे उचित स्थान पर रखा जाना चाहिए जहां बिजली, पानी और स्वच्छता की बुनियादी सुविधाएं हो।

डिटेंशन सेंटर के लिए कौन से हैं कानून

विदेशी नागरिक कानून, 1946 केंद्र को किसी विदेशी नागरिकों की आवाजाही पर रोक लगाने और व्यक्ति को किसी खास स्थान पर निवास की आवश्यकता का आदेश देने का अधिकार देता है। इसके अलावा, पासपोर्ट कानून, 1920 के तहत, केंद्र किसी भी ऐसे व्यक्ति को भारत से हटने का निर्देश दे सकता है, जिसने बिना वैध पासपोर्ट या अन्य यात्रा दस्तावेजों के यहां प्रवेश किया हो।

कहां कहां हैं डिटेंशन सेंटर

ऐसे डिटेंशन सेंटर असम (गोलपारा, कोकराझार, तेजपुर, जोरहाट, डिब्रूगढ़ और सिलचर की जिला जेलों में), एनसीआर दिल्ली (सेवा सदन - लामपुर व  महिला सदन - महिलाओं के लिए, बांग्लादेशियों के लिए शहजादबाग), पंजाब (केंद्रीय जेल, अमृतसर में), राजस्थान (अलवर में जेल परिसर में), पश्चिम बंगाल (सुधार गृह), गुजरात (भुज) और तमिलनाडु में हैं।
 
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