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‘गर्भावस्था में संबंध बनाने से मना करना क्रूरता नहीं’: हाईकोर्ट

Sun, 06 Nov 2016 11:25 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : demo pic
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हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि गर्भावस्था के दौरान पत्नी द्वारा संबंध बनाने से मना करना पति के प्रति क्रूरता नहीं है। अदालत ने कहा इस आधार पर तलाक का कोई आधार नहीं है। अदालत ने पति द्वारा दायर तलाक संबंधी याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है।
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न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग व न्यायमूर्ति प्रतिभा रानी की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा यदि पत्नी सुबह देर से सोकर उठती है और बिस्तर पर चाय की फरमाइश करती है तो स्पष्ट है कि वह आलसी है, लेकिन आलसी होना निर्दयी अथवा क्रूर होना नहीं है। 

खंडपीठ ने याची द्वारा परिवारिक अदालत द्वारा उसके तलाक संबंधी आवेदन को खारिज करने के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। याची ने तर्क रखा था कि उसकी पत्नी पिछले साढ़े चार वर्ष से शारीरिक संबंध बनाने से मना कर रही है जबकि वह किसी भी प्रकार से शारीरिक बीमार नहीं है। यह उसके प्रति क्रूरता है।
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'आलसी होना क्रूरता करना नहीं है'

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अदालत ने कहा यह कहना कि पत्नी ने अगस्त 2012 के बाद संबंध बनाने से इंकार कर दिया और यदि यह सही भी है तो उसे इस बात से समझना होगा कि मई 2012 के तीसरे सप्ताह में वह गर्भवती थी। खंडपीठ ने कहा गर्भ में बच्चा होने के समय जाहिर है कि उसके लिए संबंध बनाना असुविधाजनक रहा होगा और यदि यह मान लिया जाए कि गर्भावस्था का समय बढ़ने के साथ साथ उसने अपने पति के साथ पूरी तरह संबंध बनाना छोड़ दिया तो इससे उसकी क्रूरता साबित नहीं होती है।

अदालत ने कहा मान लिया जाये कि उसकी पत्नी देर से सोकर उठती है और चाहती है कि उसे बिस्तर पर ही चाय दी जाये, तो यह उसके आलसी होने का प्रमाण है और आलसी होना क्रूरता करना नहीं है। परिवार अदालत ने कहा कि याचिका में पति द्वारा लगाये गये आरोप बेमतलब और अस्पष्ट हैं। खंडपीठ ने निचली अदालत की इस बात पर अपनी सहमति जाहिर की कि उसने अपनी याचिका में अपनी पत्नी पर लगाये आरोपों के स्पष्ट ब्यौरे नहीं दिये हैं। 
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