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SC: 'लोकतांत्रिक देश को पुलिस स्टेट की तरह काम नहीं करना चाहिए', बेल खारिज होने के बढ़ते मामलों पर कोर्ट

Tue, 18 Mar 2025 02:05 PM IST
कुमार विवेक न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Supreme Court: न्यायालय ने कहा कि दो दशक पहले छोटे मामलों में जमानत याचिकाएं शायद ही कभी उच्च न्यायालयों तक पहुंचती थीं, शीर्ष न्यायालय तक तो बात ही छोड़िए। न्यायमूर्ति ओका ने एक जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। अदालत ने आगे क्या कहा, आइए जानते हैं।
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उपासना स्थल कानून पर नई याचिकाओं से सुप्रीम कोर्ट नाराज - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने जांच पूरी होने के बावजूद निचली अदालतों की ओर से ‘‘जो मामले गंभीर नहीं हैं’’ उनमें भी जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने पर निराशा जाहिर की है। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने सोमवार को कहा कि एक लोकतांत्रिक देश को पुलिस राज्य की तरह काम नहीं करना चाहिए। जहां कानून प्रवर्तन एजेंसियां बिना किसी वास्तविक आवश्यकता के व्यक्तियों को हिरासत में लेने के लिए मनमानी शक्तियों का प्रयोग करती हैं।

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न्यायालय ने कहा कि दो दशक पहले छोटे मामलों में जमानत याचिकाएं शायद ही कभी उच्च न्यायालयों तक पहुंचती थीं, शीर्ष न्यायालय तक तो बात ही छोड़िए। न्यायमूर्ति ओका ने एक जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा, "यह चौंकाने वाला है कि सर्वोच्च न्यायालय उन मामलों में जमानत याचिकाओं पर फैसला सुना रहा है, जिनका निपटारा ट्रायल कोर्ट के स्तर पर किया जाना चाहिए। व्यवस्था पर अनावश्यक रूप से बोझ डाला जा रहा है।"

यह पहली बार नहीं है जब शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे को उठाया है। इसने बार-बार ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट से जमानत देने में ज्यादा उदार रुख अपनाने का आग्रह किया है, खास तौर पर छोटे-मोटे उल्लंघनों वाले मामलों में।

निचली अदालतों की ओर से जमानत देने से इनकार पर कोर्ट की टिप्पणी

सर्वोच्च न्यायालय ने पहले भी निचली अदालतों की ओर से जमानत देने से इनकार करने पर अपनी नाराजगी व्यक्त की थी, जिसे उसने "बौद्धिक बेईमानी" कहा था। अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के महत्व पर बल देने वाले कई निर्देश दिए थे।

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मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने एक आरोपी को जमानत दे दी जो धोखाधड़ी के एक मामले में दो साल से अधिक समय से हिरासत में था। जांच पूरी हो जाने और आरोपपत्र दायर हो जाने के बावजूद, आरोपी की जमानत याचिका ट्रायल कोर्ट और गुजरात उच्च न्यायालय दोनों ने खारिज कर दी थी।

 

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न्यायमूर्ति ओका ने कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मजिस्ट्रेट की ओर से सुनवाई योग्य मामलों में जमानत के मामले सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लाए जा रहे हैं। हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि लोगों को उस समय जमानत नहीं मिल रही है, जब उन्हें मिलनी चाहिए।"

2022 में सुप्रीम कोर्ट ने दिए थे ये निर्देश

वर्ष 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने जांच एजेंसियों पर उन संज्ञेय अपराधों में गिरफ्तारी करने पर प्रतिबंध लगा दिया था जिनमें हिरासत की आवश्यकता न होने पर अधिकतम सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। इसने निचली अदालतों से यह सुनिश्चित करके व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने का भी आग्रह किया था कि जमानत निष्पक्ष तरीके से और समय पर दी जाए। पीठ ने कहा कि जिस आरोपी ने जांच में सहयोग किया हो और जिसे जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया गया हो, उसे सिर्फ आरोपपत्र दाखिल होने के बाद हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए।

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पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पिछड़ा वर्ग के लिए राज्य आयोग पिछड़ेपन के मुद्दे की नए सिरे से जांच कर रहा है। राज्य सरकार ने जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ को सूचित किया कि पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग की कवायद तीन महीने के भीतर पूरी होने की संभावना है।

सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश में सार्वजनिक कार्यों के विभिन्न ठेके मुख्यमंत्री पेमा खांडू के परिवार के सदस्यों से जुड़ी कंपनियों को दिए जाने के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए केंद्र से स्पष्ट जवाब देने को कहा। सीजेआई संजीव खन्ना, जस्टिस पीवी संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने केंद्रीय वित्त मंत्रालय और केंद्रीय गृह मंत्रालय से रिपोर्ट दाखिल करने और आरोपों पर स्पष्टीकरण देने के लिए कहा।

नाबालिग से 1986 में दुष्कर्म दोषी की सजा पर सुप्रीम मुहर
सुप्रीम कोर्ट ने 1986 में एक नाबालिग लड़की से दुष्कर्म के लिए ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धी को बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने साथ ही पीड़िता व उसके परिवार के इस मामले में न्याय के लिए चार दशक तक इंतजार करने पर दुख जताया। जस्टिस विक्रम नाथ व जस्टिस संजय करोल की पीठ ने राजस्थान सरकार की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के जुलाई 2013 के फैसले को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने दोषी व्यक्ति को बरी कर दिया था।

पीठ ने कहा, यह बहुत दुख की बात है कि इस नाबालिग लड़की और उसके परिवार को अपने जीवन के इस भयावह अध्याय के समापन के इंतजार में चार दशक गुजारने पड़े। पीठ ने इस मामले से निपटने के हाईकोर्ट के तरीके पर भी आश्चर्य जताया। साथ ही उसके फैसले में पीड़िता का नाम आने पर नाराजगी जताई। नवंबर 1987 में एक ट्रायल कोर्ट ने तत्कालीन 21 वर्षीय व्यक्ति को दोषी ठहराते हुए सात साल कैद की सजा सुनाई थी। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट की ओर से बरी किए जाने के पीछे मुख्य तर्क नाबालिग पीड़िता समेत अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान थे। पीठ ने कहा, यह सच है कि बाल गवाह (पीड़िता) ने अपने खिलाफ अपराध के बारे में कुछ भी नहीं बताया है। घटना के बारे में पूछे जाने पर, ट्रायल जज ने दर्ज किया कि ‘वी’ (पीड़िता) चुप थी और आगे पूछे जाने पर उसने केवल आंसू बहाए और इससे ज्यादा कुछ नहीं। शीर्ष अदालत ने कहा, हमारे विचार में, इसे प्रतिवादी (आरोपी) के पक्ष में एक कारक के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। ‘वी’ के आंसुओं को उनके महत्व के अनुसार समझा जाना चाहिए। यह चुप्पी प्रतिवादी के लाभ के लिए नहीं हो सकती। पीठ ने कहा कि यह चुप्पी एक बच्चे की चुप्पी थी और इसे पूरी तरह से जागरूक वयस्क उत्तरजीवी की चुप्पी के बराबर नहीं माना जा सकता है, जिसे फिर से अपनी परिस्थितियों में तौलना होगा। अदालत ने कहा कि आघात ने उत्तरजीवी को चुप्पी में डुबो दिया है और उसके युवा कंधों पर पूरे अभियोजन पक्ष का भार डालना अनुचित होगा।

पूर्व आईएएस प्रशिक्षु पूजा खेड़कर की गिरफ्तारी पर रोक बढ़ाई
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की पूर्व प्रशिक्षु अधिकारी पूजा खेड़कर को गिरफ्तारी से संरक्षण देने के अपने अंतरिम आदेश को बढ़ा दिया। खेड़कर पर 2022 के संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) परीक्षा के लिए पात्रता प्राप्त करने के लिए अपने दस्तावेजों में जालसाजी करने का आरोप है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीष चंद्र शर्मा की पीठ ने दिल्ली पुलिस इस मामले की जांच जल्द पूरी करने को कहा। पीठ ने पूछा कि जब खेडकर ने स्वयं हलफनामे में कहा था कि वह सहयोग करने को तैयार हैं, तो दिल्ली पुलिस जांच पूरी क्यों नहीं कर रही है। इसके साथ ही पीठ ने खेडकर की ओर से दायर अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के लिए 15 अप्रैल की तारीख तय की।

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य पुल निगम लिमिटेड पर ताज ट्रेपेजियम जोन में फ्लाईओवर के निर्माण को बिना पूर्व अनुमति के आगे बढ़ाने के लिए 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। जस्टिस अभय एस ओका व जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने राज्य सरकार की फर्म के रवैये पर आश्चर्य जताया और उसके फैसले पर सवाल उठाया। इसमें ताज ट्रेपेजियम जोन (टीटीजेड) में कई पेड़ों को गिराना और स्थानांतरित करना भी शामिल है।

दिल्ली एनसीआर के बिल्डरों और बैंकों के बीच गठजोड़ के कारण मंझधार में फंसे हजारों फ्लैट खरीदारों के दर्द पर सुप्रीम कोर्ट ने मरहम लगाया है। कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर के घर खरीदारों और निवेशकों की मेहनत की गाढ़ी कमाई ठगने वाले बिल्डरों और बैंकों के गठजोड़ की जांच करने के लिए सीबीआई को अपना रोडमैप देने के लिए कहा है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा, हम मामले की जड़ तक जाएंगे। दोषी धरती पर कहीं भी छिपे हों, उन्हें ढूंढ निकाला जाएगा। साथ ही पीठ ने अदालत की सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव जैन को न्याय मित्र नियुक्त किया। पीठ से जैन से एक संक्षिप्त नोट दाखिल करने का आग्रह किया कि मामले को आगे कैसे बढ़ाया जाए।

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समयबद्ध सीबीआई-सीवीसी जांच पर केंद्र से जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से एक जनहित याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा जिसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) को मामलों की समयबद्ध तरीके से जांच करने के लिए दिशानिर्देश देने की मांग की गई है। यह जनहित याचिका अधिवक्ता मनीष पाठक द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने सीबीआई के पास 2,500 से अधिक मामले लंबित होने का मुद्दा उठाया था।
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