लोकसभा चुनाव समाप्त हो चुके हैं और केंद्र में नई सरकार ने कामकाज शुरू कर दिया है। नई सरकार बनते ही जम्मू-कश्मीर अचानक सुर्खियों में आ गया। वजह थी नई सरकार की नई नीतियां और राज्य के परिसीमन को लेकर आने वाली खबरें। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं है कि परिसीमन होगा भी या नहीं। लेकिन फिर भी हम आपको बताना चाहते हैं कि आखिर यह परिसीमन क्या होता है?
अगर जम्मू-कश्मीर में परिसीमन हुआ तो राज्य के तीन क्षेत्रों- जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में विधानसभा सीटों की संख्या में बदलाव हो जाएगा। इसकी वजह से जम्मू और कश्मीर के विधानसभा क्षेत्रों का नक्शा पूरी तरह बदल सकता है। जम्मू और कश्मीर की राजनीति में अब तक कश्मीर का ही पलड़ा भारी रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि विधानसभा में कश्मीर की विधानसभा सीटें, जम्मू के मुकाबले ज्यादा हैं।
परिसीमन आयोग को भारतीय सीमा आयोग भी कहा जाता है। परिसीमन से तात्पर्य किसी भी राज्य की लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं (राजनीतिक) का रेखांकन है। अर्थात इसके माध्यम से लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की हदें तय की जाती हैं। संविधान के अनुच्छेद 82 के मुताबिक, सरकार हर 10 साल बाद परिसीमन आयोग का गठन कर सकती है। इसके तहत जनसंख्या के आधार पर विभिन्न विधानसभा व लोकसभा क्षेत्रों का निर्धारण होता है। जनसंख्या के हिसाब से अनुसूचित जाति-जनजाति सीटों की संख्या बदल जाती है।
परिसीमन का उद्देश्य ताजा जनगणना के आधार पर सभी लोकसभा और विधानसभा सीटों की दोबारा सीमाएं निर्धारित करना है। हालांकि अब नई जनगणना 2021 में होगी। सीमाएं पुनर्निर्धारण में जनप्रतिनिधियों (सीटों) की संख्या यथावत रहती है अर्थात इनमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं होता। अनुसूचित जाति और जनजाति की विधानसभा सीटों का निर्धारण क्षेत्र की जनगणना के अनुसार होता है।
परिसीमन के चलते जातिगत आधार पर सीटों की संख्या कम या ज्यादा होती है। अंतिम परिसीमन के मुताबिक अनुसूचित जाति और जनजाति की सीटें भी बढ़ी हैं और इनकी संख्या बढ़कर 125 हो गई। इसके चलते कई मौजूदा सांसदों को अपनी सीटें छोड़नी पड़ीं। इनमें पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल और लोकसभा अध्यक्ष स्व. सोमनाथ चटर्जी भी शामिल हैं। परिसीमन आयोग का अध्यक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त होता है। वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा इस आयोग के अध्यक्ष हैं। वहीं राज्य के चुनाव आयुक्त इसके सदस्य होते हैं।