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ईवी: दिल्ली-एनसीआर में इलेक्ट्रिक गाड़ियों का बढ़ेगा चलन, चार्जिंग से लेकर कीमत तक क्या हैं चुनौतियां?

Sat, 10 Oct 2026 08:33 AM IST
संकल्प प्रकाश सिंह स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

दिल्ली-एनसीआर में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की तैयारी है, लेकिन इस बदलाव की राह आसान नहीं है। चार्जिंग स्टेशन, बिजली की बढ़ती मांग और गाड़ियों की कीमत जैसी चुनौतियों के बीच जानिए ईवी को लेकर क्या है पूरा प्लान।
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EV - फोटो : AI Generated
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विस्तार
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दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की समस्या हर साल सर्दियों के दौरान काफी गंभीर रूप ले लेती है। हवा में घुले बारीक कण लोगों के स्वास्थ्य पर असर डालते हैं। इस दौरान सांस लेना भी काफी मुश्किल होता है। इस प्रदूषण के पीछे वाहनों से निकलने वाला धुआं भी एक प्रमुख कारण है। ऐसे में प्रदूषण को कम करने के लिए पेट्रोल-डीजल वाली गाड़ियों पर निर्भरता घटाना और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना जरूरी माना जा रहा है। इसी दिशा में दिल्ली-एनसीआर में नई पेट्रोल-डीजल कारों की बिक्री को लेकर एक प्रस्ताव सामने आया है, जो आने वाले वर्षों में ऑटो सेक्टर की तस्वीर बदल सकता है।
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दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण को कम करने के लिए अब निजी वाहनों को इलेक्ट्रिक बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की विशेषज्ञ समिति ने एक ऐसी योजना सुझाइ है, जिसके तहत आने वाले वर्षों में नई कारों की बिक्री में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ाई जा सकती है। इस प्रस्ताव की मानें तो 2027 में नई निजी कारों में 20 फीसदी, 2028 में 45 फीसदी और 2029 में 70 फीसदी हिस्सेदारी इलेक्ट्रिक वाहनों की रखने का लक्ष्य है। इसके आगे 2031 से दिल्ली-एनसीआर में नई पेट्रोल और डीजल कारों की बिक्री और रजिस्ट्रेशन रोकने की सिफारिश की गई है। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो इस तारीख के बाद नई निजी कारों के लिए इलेक्ट्रिक विकल्प ही उपलब्ध कराने की योजना होगी।

प्रस्ताव में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की योजना सिर्फ निजी कारों तक सीमित नहीं है। इसके तहत अप्रैल 2027 से नए ऑटो, दोपहिया टैक्सी, डिलीवरी वाहनों और हल्के मालवाहक वाहनों का रजिस्ट्रेशन केवल इलेक्ट्रिक श्रेणी में करने की सिफारिश की गई है। इसके अगले चरण में अप्रैल 2028 से नई कैब, टैक्सी, बसों और निजी इस्तेमाल वाले दोपहिया वाहनों को भी इलेक्ट्रिक बनाने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं मध्यम और भारी मालवाहक वाहनों को 2031-32 तक चरणबद्ध तरीके से इलेक्ट्रिक श्रेणी में लाने का सुझाव दिया गया है।
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ये जो प्रस्तावित योजना है उसका दायरा सिर्फ नई पेट्रोल-डीजल गाड़ियों की बिक्री पर रोक लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें पहले से सड़कों पर चल रहे पुराने वाहनों को भी धीरे-धीरे हटाने की रूपरेखा को सुझाया गया है। इसके अंतर्गत 2035 तक बीएस-6 दोपहिया वहनों को और 2040 तक चार पहिया वाहनों को चरणबद्ध ढंग से हटाने की सिफारिश कई गई है।  

इसके लिए वाहनों के उत्सर्जन मानकों के आधार पर अलग-अलग समयसीमा तय करने का सुझाव है। इस योजना के मुताबिक BS-1, BS-2 और BS-3 मानकों वाले पुराने वाहनों को सबसे पहले हटया जाएगा। इसके बाद 2030 तक BS-4 श्रेणी के वाहनों को चरणबद्ध ढंग से सड़कों से हटाने का प्रस्ताव है। वहीं BS-6 मानक वाले दोपहिया वाहनों को 2035 तक और चारपहिया वाहनों को 2040 तक हटाने की सिफारिश की गई है। इस कारण योजना का उद्देश्य केवल नई गाड़ियों को इलेक्ट्रिक विकल्पों की ओर ले जाना नहीं है बल्कि पुराने प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को भी चरणबद्ध तरीके से हटाना भी है।
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EV - फोटो : AI Generated

क्या हैं चुनौतियां?

दिल्ली-एनसीआर में पेट्रोल-डीजल वाहनों की जगह इलेक्ट्रिक गाड़ियों को लाने की योजना को लेकर ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की कुछ चिंताएं भी हैं। वाहन कंपनियों से जुड़े लोगों का मानना है कि बदलाव की दिशा तो साफ है, लेकिन इसे बहुत कम समय में लागू करना आसान नहीं होगा। दिल्ली देश के प्रमुख पैसेंजर व्हीकल बाजारों में से एक है। ऐसे में यहां बड़ी संख्या में वाहनों को इलेक्ट्रिक श्रेणी में बदलने के लिए सिर्फ नए नियम बनाना काफी नहीं होगा बल्कि इसके लिए जरूरी इंफ्रासट्रक्चर भी तैयार करने की जरूरत होगी। 

सबसे बड़ी चुनौती चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की है। अगर लोगों को अपने घर, दफ्तर या रास्ते में आसानी से चार्जिंग स्टेशन नहीं मिलेंगे, तो वे इलेक्ट्रिक कार खरीदने से पहले कई बार सोचेंगे। इसके अलावा एक साथ बड़ी संख्या में इलेक्ट्रिक वाहन सड़कों पर आने से बिजली की मांग बढ़ेगी। इसके लिए बिजली के नेटवर्क और ग्रिड की क्षमता को मजबूत करना होगा। ऐसे में ऑटो इंडस्ट्री की चिंता यही है कि इन तैयारियों के बिना तेजी से बदलाव का लक्ष्य कंपनियों और ग्राहकों दोनों के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है।

इन्हीं समस्याओं को देखते हुए रिपोर्ट में कुछ अहम बदलावों की सिफारिश की गई है। प्रस्ताव के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति सोसायटी में अपनी तय पार्किंग की जगह पर ईवी चार्जर लगाना चाहता है, तो उसे आरडब्ल्यूए से एनओसी लेने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। इसके लिए केवल सोसायटी को सूचना देना पर्याप्त होगा। इसके अलावा बिजली वितरण कंपनियों के लिए भी समयसीमा तय करने का सुझाव दिया गया है। अगर किसी उपभोक्ता को ईवी चार्जिंग के लिए नया बिजली कनेक्शन चाहिए, तो संबंधित कंपनी को मांग मिलने के 15 दिनों के भीतर कनेक्शन उपलब्ध कराना होगा। इन कदमों का उद्देश्य चार्जिंग से जुड़ी प्रशासनिक अड़चनों को कम करना और लोगों के लिए इलेक्ट्रिक वाहन इस्तेमाल करना आसान बनाना है।

इसके अलावा इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद को लोगों के लिए किफायती बनाने के उद्देश्य से रिपोर्ट में आर्थिक प्रोत्साहन देने की भी सिफारिश की गई है। प्रस्ताव के मुताबिक, पुरनी गाड़ी स्क्रैप कराकर नई इलेक्ट्रिक कार या टैक्सी खरीदने वालों को एक लाख रुपये तक की प्रोत्साहन राशि और एक लाख रुपये तक का स्क्रैपेज बोनस मिल सकता है। वहीं इलेक्ट्रिक ऑटो खरीदने पर 50 हजार रुपये और इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन पर 30 हजार रुपये तक की आर्थिक सहायता देने का सुझाव दिया गया है। इसका उद्देश्य लोगों को पुराने प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की जगह इलेक्ट्रिक विकल्प अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। 
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