मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत की ओर से विभिन्न फैसलों में विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्तियों के बंटवारे की अवधारणा निर्धारित की गई है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि न्यायपालिका का काम किसी कानून की वैधता को परखना है, उसमें संशोधन या बदलाव करना नहीं। इसके साथ ही अदालत ने गैर फिल्मी गानों को टीवी या सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से रिलीज करने से पहले उनकी समीक्षा के लिए सेंसर बोर्ड के गठन की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।
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मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत की ओर से विभिन्न फैसलों में विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्तियों के बंटवारे की अवधारणा निर्धारित की गई है। अदालतें न कोई कानून बना सकती हैं और न ही किसी कानून में प्रावधान जोड़ सकती हैं। संविधान में इसकी अनुमति नहीं है। पीठ ने कहा, जहां तक टीवी पर सामग्री के प्रदर्शन का मामला है, तो इसके लिए सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 और केबल टेलीविजन नेटवर्क (नियमन) अधिनियम, 1995 है।
पीठ ने कहा- विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से उपलब्ध सूचना या सामग्री को नियमित करने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से स्पष्ट नियम या व्यवस्था निर्धारित की गई है। याचिकाकर्ता की यह दलील गलत है कि कोई नियामक प्राधिकरण नहीं है। एक नियामक प्राधिकरण बनाने के लिए निर्देश देने का परिणाम इस न्यायालय की ओर से कानून के रूप में होगा, जिसकी अनुमति नहीं है।