सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट से दिल्ली जिमखाना क्लब के 11 सदस्यों की याचिका पर विचार करने को कहा। इन सदस्यों ने क्लब के 27.3 एकड़ परिसर को अपने कब्जे में लेने के केंद्र सरकार के फैसले और उसके बाद की बेदखली की कार्रवाई को चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने क्यों सुनवाई से किया था इनकार?
चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच को क्लब के सदस्यों की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने बताया कि दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था। कोर्ट का कहना था कि केंद्र सरकार के फैसले को सिर्फ क्लब ही चुनौती दे सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सिंह ने बताया कि हाई कोर्ट ने सदस्यों से कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट से यह स्पष्टीकरण ले लें कि क्या वे भी वहां याचिका दायर कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें हाईकोर्ट जाने की इजाजत दे दी, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि दूसरी पार्टी केस की स्वीकार्यता और अन्य कानूनी आपत्तियों के आधार पर विरोध कर सकती है।
हाईकोर्ट ने अपनी सुनवाई में क्या कहा था?
11 सदस्यों की ओर से पेश सिंह ने पहले बेंच को बताया था कि अभी क्लब का कामकाज केंद्र सरकार की बनाई एक कमेटी देख रही है और वह सरकार के खिलाफ कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकती। 3 सितंबर को, केंद्र सरकार ने एक अलग मामले में दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि सफदरजंग रोड स्थित परिसर से क्लब को हटाने के संबंध में 16 सितंबर तक क्लब के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी।
हाईकोर्ट, क्लब के सदस्य विजय खुराना और अन्य लोगों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। इन याचिकाओं में 'लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस' (L&DO) के एस्टेट ऑफिसर द्वारा क्लब के मैनेजमेंट को 29 जून को जारी किए गए बेदखली के 'शो-कॉज नोटिस' (कारण बताओ नोटिस) पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
विपिन अग्रवाल और क्लब के 10 अन्य सदस्यों ने वकील नितिन सलूजा के माध्यम से दायर अपनी याचिका में L&DO द्वारा 22 मई को जारी 'रिजम्पशन नोटिफिकेशन' (संपत्ति वापस लेने का नोटिस) और एस्टेट ऑफिसर द्वारा 29 जून को जारी 'शो-कॉज नोटिस' को रद्द करने की मांग की।