कहते हैं कि भगवान का दर सबके लिए खुला होता है। अमीर हो या गरीब, परमात्मा के सामने सभी बराबर हैं। लेकिन अनेक धार्मिक स्थलों के पूजा घर इस तरह बने होते हैं, जहां दिव्यांग लोग पहुंच नहीं पाते। इससे उनका पूजा करने का अधिकार अपूर्ण रह जाता है और उनकी धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकेगा। दिल्ली के दिव्यांग जन कार्यालय के आयुक्त ने सभी धार्मिक स्थलों को दिव्यांगों के लिए सुगम्य (Accessible) बनाने का आदेश जारी किया है।
राजधानी के सभी जिलाधिकारियों को 15 अक्टूबर को भेजे गए आदेश में कहा गया है कि वे अपने क्षेत्र के सभी धार्मिक स्थलों के सुगम्य होने या न होने पर तीन माह के भीतर एक रिपोर्ट दाखिल करें। जिन धार्मिक स्थलों में दिव्यांगों के लिए अभी उपयुक्त सुविधाएं नहीं हैं, वहां के लिए एक तिथि निश्चित करके बताएं कि उनको कब तक सुगम्य बनाया जा सकेगा। इसके लिए अधिकारियों को धार्मिक भवनों का संचालन कर रहे व्यक्ति/संगठन से बात करने का सुझाव दिया गया है। एक आदेश के मुताबिक 15 जुलाई 2022 तक सभी धार्मिक स्थलों को दिव्यांगों के लिए सुगम्य बनाना अनिवार्य है।
दिव्यांग जन आयुक्त कार्यालय के आयुक्त टीडी धारियाल ने अमर उजाला से कहा कि दिव्यांग जन अधिकार कानून के तहत उन्हें वे सभी सुविधाएं देनी अनिवार्य हैं, जो किसी भी जन सामान्य को उपलब्ध हैं। संयुक्त राष्ट्र ने भी इसके संदर्भ में कई सुझाव जारी किये हैं। लेकिन उन्होंने कई धार्मिक इमारतों का निरीक्षण करके पाया है कि दिव्यांगों को उनका अधिकार नहीं मिल रहा है। इसीलिए उन्होंने सभी धार्मिक भवनों को सुगम्य बनाने का निर्देश जारी किया है।
दिल्ली के पूर्वी दिल्ली जिले में सबसे ज्यादा 457 बड़े धार्मिक स्थल हैं। दक्षिण-पूर्व जिले में 283, उत्तर-पूर्व में 101, उत्तरी जिले में 110, शाहदरा में 263, नई दिल्ली में 85, पश्चिमी दिल्ली में 202, केंद्रीय दिल्ली में 22, उत्तर-पश्चिम में 326, दक्षिण-पश्चिम में 430 और दक्षिणी जिले में 50 धार्मिक स्थल हैं। पूर्वी दिल्ली के केवल 28 धार्मिक स्थल दिव्यांग लोगों को मुख्य पूजा स्थल तक पहुंचने के लिए उपयुक्त हैं। दक्षिण-पूर्वी और पश्चिमी जिले के दोनों जिलों में 126-126 धार्मिक स्थलों में सुगम्यता है। प्रतिशत के लिहाज से उत्तरी जिले के 73 फीसदी धार्मिक स्थल (101 में 74) सुगम्य हैं।
किसी भी पब्लिक बिल्डिंग/सर्विस के द्वारा दिव्यांगों को सुगम्यता उपलब्ध न करवाना एक दंडनीय अपराध है। (धार्मिक पूजा स्थलों को भी पब्लिक इमारतों की परिभाषा के अंदर रखा जाता है।) ऐसा न करने पर एक्ट की धारा 89 के तहत पहली बार में दस हजार रुपये तक और दूसरी बार में न्यूनतम पचास हजार रुपये से लेकर अधिकतम पांच लाख रुपये तक का दंड दिया जा सकता है।
किसी भी संस्थान के द्वारा उसके पास फंड न होने की बात नहीं कही जा सकती। यह संस्थान/ट्रस्ट की जिम्मेदारी है कि वह धार्मिक भवन में समय रहते सुगम्यता उपलब्ध करवाए। सुगम्यता के स्टैंडर्ड्स में परिस्थिति के अनुसार कुछ छूट देने की बात कही गई है, लेकिन यह सुगम्यता न देने का आधार नहीं बनाई जा सकती है।