यह सर्कुलर शिक्षा विभाग के अलावा दिल्ली हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष को भेजा गया है। सरकारी स्कूलों के अधिकारियों से जब बातचीत की गई तो उन्होंने पहली शर्त यह रख दी कि उनका नाम कहीं नहीं आना चाहिए।
यह आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने बताया, हां यह सही है कि बच्चों को हिंदी में गिनती बोलनी नहीं आती। बहुत से ऐसे बच्चे हैं जो पचास तक भी नहीं पहुंच पाते। कुछ ऐसे हैं जो सीधे दस, बीस, तीस, चालीस, पचास और साठ आदि तो बोल लेते हैं, मगर इनके बीच में क्या है, यहां वे अटक जाते हैं। इसका मुख्य कारण है कि बच्चों को नर्सरी, पहली, दूसरी और तीसरी कक्षा में गिनती बोलना नहीं सिखाया गया। ऐसा नहीं हैं कि स्टाफ नहीं है। इसके लिए कोई अलग से प्रयास भी नहीं करना होता। खेल खेल में बच्चों को यह सब सिखाया जा सकता है। इसके लिए तो कहीं न कहीं स्कूल प्रशासन दोषी है।
अब विभाग की नींद टूटी है।देखते हैं कि आठवीं तक के बच्चों को हिंदी में गिनती बोलना कैसे सिखाया जाए। स्कूलों में लैटर भेजा गया है।जल्द ही प्रगति रिपोर्ट तलब की जाएगी। बता दें कि दिल्ली में टीचर-स्टूडेंट अनुपात 30 है।