सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने न्यायालय में सोशल मीडिया पर लगाई गई रोक मामले में एक याचिका दायर की थी। लेकिन बुधवार को दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस याचिका को खारिज कर दिया। अधिकारी की याचिका में फेसबुक और इंस्टाग्राम समेत 89 सोशल नेटवर्किंग प्लेटफार्म के उपयोग पर सशस्त्र बल के कर्मियों पर लगाई गई रोक के भारतीय सेना के फैसले को चुनौती दी गई थी।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि अगर सरकार ने यह निर्णय लिया है कि सैन्य कर्मियों द्वारा फेसबुक और इंस्टाग्राम समेत अन्य सोशल नेटवर्किंग साइटों के इस्तेमाल से दुश्मन देशों को फायदा पहुंचता है तो अदालत इस फैसले में हस्तक्षेप करने की इच्छुक नहीं है।
अदालत ने कहा कि वर्तमान दौर में युद्ध कौशल केवल ‘भूभाग कब्जा करने’ तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें शत्रु देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने और ‘आंतरिक अशांति’ उत्पन्न करना भी शामिल है।
न्यायमूर्ति राजीव सहाय एंडलॉ और न्यायमूर्ति आशा मेनन की पीठ ने आदेश सुनाते हुए कहा, ‘क्षमा करिए, हम खारिज कर रहे हैं, धन्यवाद।’ उच्च न्यायालय ने कहा कि संपर्क के अन्य माध्यम अब भी याचिकाकर्ता अधिकारी के पास मौजूद हैं और यह प्रतिबंध सिर्फ कुछ सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों के संबंध में ही है।
अदालत ने लेफ्टीनेंट कर्नल पी के चौधरी की याचिका खारिज कर दी। चौधरी ने अपनी याचिका में सैन्य खुफिया महानिदेशक को जून की नीति वापस लेने का आदेश देने का अदालत से अनुरोध किया था। छह जून की नई नीति के अनुसार सेना के सभी कर्मियों को फेसबुक और इंस्टाग्राम एवं 87 अन्य सोशल मीडिया मंचों से अपने अकाउंट डिलीट करने को कहा गया था।
पीठ ने कहा, ‘हम यह भी संज्ञान में लेते हैं कि मौजूदा समय में युद्ध और अंतर-देश प्रतिद्वंद्विता और वैमनस्यता दुश्मन देश की जमीन हासिल करने और उनके प्रतिष्ठानों और ढांचों को तबाह करने तक नहीं है बल्कि यह अर्थव्यवस्था और राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित करने तथा आंतरिक कलह बढ़ाने और दुश्मन देश के नागरिकों की राजनीतिक इच्छा को प्रभावित करने तक है।’