पराली की समस्या इस वजह से भी बढ़ी है क्योंकि अब धान की फसल मजदूरों की बजाय मशीनों के द्वारा निबटाई जा रही है। यह सस्ता पड़ता है। इन मशीनों के द्वारा ज्यादा पराली छोड़ी जाती है जो बड़ी समस्या बनता है। अगर सरकार प्रति क्विंटल दो से तीन सौ रुपये के लगभग न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा दे तो किसान मजदूरों के द्वारा धान की कटाई करा सकते हैं। इससे पराली को अन्य जगह पर इकट्ठा करके अन्य तरीके से उपयोग किया जा सकता है। लेकिन सरकार मशीनों पर सब्सिडी बढ़ा रही है, जबकि मजदूरों का उपयोग कम हो रहा है जो पराली की समस्या को बढ़ा रहा है।
70 फीसदी प्रदूषण पर चर्चा क्यों नहीं
किसान नेता सरदार वीएम सिंह ने कहा कि पराली को प्रदूषण का कारण बताना अपनी जिम्मेदारी दूसरों के सर पर डालने जैसा है। उन्होंने कहा कि सरकारों को जवाब देना चाहिए कि किसानों की पराली खरीदी क्यों नहीं जाती? अपने स्तर पर पराली को खेतों से हटाने के लिए किसानों को प्रति क्विंटल के हिसाब से 200 से 300 रुपये के बीच सब्सिडी क्यों नहीं दी जाती?
उन्होंने कहा कि सच्चाई यह है कि दिल्ली के प्रदूषण में 70 फीसदी से अधिक हिस्सा स्थानीय प्रदूषण के कारणों की वजह से है। ऐसे में उन कारणों के लिए कोई जिम्मेदारी क्यों नहीं लेता? पराली की समस्या केवल चंद दिनों के बीच होती है, जबकि प्रदूषण स्थायी समस्या बन चुका है। इसपर किसी समाधान की बात क्यों नहीं की जाती?
पराली खरीदने को कोई तैयार नहीं
कुरुक्षेत्र के किसान गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने अमर उजाला को बताया कि पराली को अनेक प्रकार से इस्तेमाल करने के तरीके सामने आ चुके हैं। पराली से पेपर बनाने के साथ-साथ बिजली संयंत्रों में इस्तेमाल करने की तकनीकी सामने आ चुकी है। लेकिन सच्चाई यह है कि कोई भी उनकी पराली खरीदने को सामने नहीं आता है। किसानों को मजबूरन पराली को जलाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।