विकलांगता किसी मायने में सफलता में बाधक नहीं बन सकती है। मैं इसी मान्यता (मिथ) को बदलना चाहती थी। अपनों का साथ, जिंदगी को खुश होकर जीने का सलीका, जीवन में लक्ष्य को निर्धारित करने का जज्बा आत्मविश्वास ही नहीं, बल्कि जीत का रास्ता भी दिखाता है। बेशक मैं जन्मजात दिव्यांग नहीं थी, इसलिए व्हील चेयर पर रहकर जिंदगी को दर्द, दया या मैं कुछ नहीं कर सकती हूं, से नहीं जीना चाहती थी। मेरी जीत से दिव्यांगों के लिए लोगों की सोच भी बदलेगी।
यह कहना है रियो में गोला फेंक एफ-53 में रजत पदक जीतकर पैरालंपिक ओलंपिक में पदक हासिल करने वाली देश की पहली महिला खिलाड़ी दीपा मलिक का। अमर उजाला संवाददाता सीमा शर्मा से विशेष बातचीत में दीपा ने कहा कि वे विकलांगों के साथ-साथ बेटियों को आगे बढ़ाने पर भी काम करेंगी। आईआईटी दिल्ली में महिला स्टार्टअप कार्यक्रम में महिलाओं को स्वावंलबी बनने के साथ दीपा ने जीत का गुर भी दिया।
दीपा का कहना है कि जब क्वालिफाई किया था तो सातवां रैंक था। लेकिन मुझे पूरा विश्वास था कि जीत जरूर मिलेगी। पति भारतीय सेना में अधिकारी हैं। बीमारी के दौरान आर्मी हॉस्पिटल में बार्डर पर देश की खातिर गोली खाने वाले जवानों को जिंदगी की जंग लड़ते देखा। उस हौंसले ने मुझे भी आगे बढने का हौंसला दिया। रियो में जीत के बाद मुझे अपने देश और परिवार की कमी खली। हालांकि मुझे इंटरनेशनल मीडिया से पता चला कि मेरी जीत ट्वीट ट्रेंड पर है।