वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में वर्तमान में उपलब्ध टीका जी 3 स्ट्रेन पर आधारित है, जो जी-1 के खिलाफ पूरी तरह प्रभावी नहीं है। वायरस में आ रहे इस बदलाव के लिए वैज्ञानिकों ने सूअरों में एंटीबॉडी की जांच की गई तो इनमें सीरो प्रिवेलेंस दर 14% पाई गई जिसका मतलब है कि वे वायरस के स्थायी कैरियर बने हुए हैं।
भारतीय बच्चों के लिए जानलेवा जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) वायरस अब जीनोटाइप में बदलाव के कारण और भी जटिल चुनौती बनता जा रहा है। यह जानकारी पुणे स्थित आईसीएमआर-राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (एनआईवी) के विशेषज्ञों ने हासिल की है। इनके मुताबिक देश में अब तक सबसे ज्यादा पाया जाने वाला जी-3 जीनोटाइप तेजी से जी-1 जीनोटाइप से प्रतिस्थापित हो रहा है।
विज्ञापन
वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में वर्तमान में उपलब्ध टीका जी 3 स्ट्रेन पर आधारित है, जो जी-1 के खिलाफ पूरी तरह प्रभावी नहीं है। वायरस में आ रहे इस बदलाव के लिए वैज्ञानिकों ने सूअरों में एंटीबॉडी की जांच की गई तो इनमें सीरो प्रिवेलेंस दर 14% पाई गई जिसका मतलब है कि वे वायरस के स्थायी कैरियर बने हुए हैं। जबकि 2019 में ओडिशा और आस-पास के क्षेत्रों से जी-1 जीनोटाइप की पुष्टि पहले ही हो चुकी थी। एनआईवी के निदेशक डॉ. नवीन कुमार का कहना है कि भारत जैसे जापानी इंसेफेलाइटिस को लेकर एंडेमिक बनने की राह पर आगे बढ़ रहा है। उस बीच वायरस के जीनोटाइप में बदलाव का मतलब है कि अब हमें टीका रणनीति पर फिर से विचार करना चाहिए।
हर राज्य में वायरस का स्वरूप अलग
एनआईवी के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में यह पाया है कि इस वक्त उत्तर प्रदेश में जापानी इंसेफेलाइटिस के दोनों जीनोटाइप जी-3 और जी-1 मरीजों में प्रसारित हो रहे हैं। इनमें से जी-3 जीनोटाइप ऐसा है जो उत्तर प्रदेश के बच्चों में सबसे अधिक जानलेवा बना हुआ है। इसी तरह बिहार में अभी जी-1 जीनोटाइप पाया गया है, जबकि असम में यह दोनों जीनोटाइप मिल चुके हैं। इनके अलावा ओड़िशा में जी 1 टाइप सबसे ज्यादा मरीजों में मिला है।
टीके का कम होगा प्रभाव
भारत में जापानी इंसेफेलाइटिस को लेकर जेनवैक टीका की खुराक दी जाती है जिसे भारत बायोटेक द्वारा बनाया गया है। यह टीका वायरस के जी-3 जीनोटाइप के खिलाफ काफी असरदार पाया गया है लेकिन जी-1 जीनोटाइप के खिलाफ इसकी न्यूट्रलाइजिंग क्षमता काफी सीमित है। इसका मतलब है कि अगर जी-1 देश में प्रमुख स्ट्रेन बनता है, तो जेनवैक की प्रभावशीलता पर असर पड़ सकता है।
भारत में बच्चों पर जेई का असर
जेई भारत में एक प्रमुख बाल स्वास्थ्य संकट है। हर साल सैकड़ों बच्चे मस्तिष्क ज्वर, दौरे और अन्य न्यूरोलॉजिकल जटिलताओं से जूझते हैं। भारत सरकार ने जेई को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी) में शामिल किया है, लेकिन टीके की प्रभावशीलता अब वैज्ञानिक विमर्श का विषय बन चुकी है। आंकड़े बताते हैं कि 2010 से 2017 तक, 63,854 तीव्र इंसेफेलाइटिस मामलों में से 13.7% जेई वायरस के कारण थे, और इनमे से 17% मामलों में मृत्यु हुई।