क्या ऐसा हुआ है कि एक मृत व्यक्ति खुद कोर्ट में आकर याचिका दाखिल करे और अपने पक्ष में आदेश हासिल कर वापस चला जाए। एनजीटी में बूचड़ख़ाना चलाने से संबंधित अलीजान बनाम उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के मामले में ऐसा ही मामला उजागर हुआ है। दरअसल बूचड़ख़ाना चलाने के लिए ट्रिब्यूनल को गुमराह करने का यह हथकंडा है।
बूचडख़ाना चलाने वाले यूपी के हापुड़ निवासी अलीजान वर्ष 2013 में मर चुके हैं और इस पर सरकारी मुहर भी लग चुकी है। उनका मृत्यु प्रमाण पत्र भी एनजीटी पहुंच चुका है, लेकिन 2015 में उनके नाम और हस्ताक्षर के साथ एनजीटी में हलफनामा और याचिका दाखिल की गई।
मृतक और कथित अलीजान ने तथ्यों को छुपाकर बताया कि उनके पास बूचड़ख़ाना और मीट गोदाम चलाने के लिए नगर पालिका का लाइसेंस है, जबकि यूपीपीसीबी अनुमति के लिए तैयार नहीं है। जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका पर गौर करते हुए 3 फरवरी, 2015 को आदेश दिया कि याची दो हफ्तों के भीतर यूपीपीसीबी से बूचडख़ाना चलाने की अनुमति हासिल करने के लिए आवेदन करे। वहीं बोर्ड इस आवेदन पर तेजी से कार्यवाही करे। इस आदेश के साथ पीठ ने याचिका का निपटारा कर दिया। अब यह पूरा मामला एनजीटी में जस्टिस जावद रहीम की अध्यक्षता के संज्ञान में आया है और प्राधिकरणों के जरिये इस पर पर्दा डालने की कोशिश हो रही है। हालांकि एनजीटी इस कारनामे पर किसी को बख्शने के मूड में नहीं है।
जून, 2016 में एनजीटी में हापुड़ जिले में भू-जल दोहन करने वाले बूचड़ख़ानों के खिलाफ पर्यावरणविद व याची शैलेश सिंह ने याचिका दाखिल की। याची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बावजूद हापुड़ में उस्मानिया मस्जिद कोटला मेवातिया इलाके में अवैध रूप से बूचडख़ाने चलाए जा रहे हैं और इसमें अलीजान नाम के व्यक्ति का बूचडख़ाना और मीट गोडाउन शामिल है। शैलेश सिंह ने सूचना के अधिकार के आधार पर आरोप लगाया कि अलीजान के पक्ष में 20 नए बूचड़ख़ानों को अनुमति दी गई।
ऐसे खुला मामला
अलीजान की ओर से पेश वकील ने अपनी दलील में कहा कि अलीजान तो तीन-चार वर्ष पहले मर चुका है ऐसे में उसका बूचड़ख़ाना कैसे प्रदूषण कर सकता है। जबकि पीठ ने इस दलील को पकड़ा और कहा कि यदि अलीजान तीन वर्ष पहले यानी 2013 में मर चुका है तो फिर 2015 में उसने याचिका कैसे दाखिल की? इस पर अलीजान की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि उनके बेटे ने याचिका दाखिल की थी, भूल से अलीजान का नाम हलफनामे में चला गया। हस्ताक्षर अलीजान के कैसे आए? इस सवाल पर भी भूल होने की दलील दी गई। हालांकि पीठ ने ट्रिब्यूनल को गुमराह करने का अंदेशा जताते हुए अपनी टिप्पणी में कहा कि इसे या तो स्पष्ट करें या फिर जेल जाने को तैयार रहें। अगली सुनवाई अप्रैल में होनी है।