मुंबई के पुलिस आयुक्त संजय पांडे हाल ही में तब चर्चाओं में आ गए जब उन्होंने पुलिस अधिकारियों को जारी एक सर्कुलर में कहा था कि पॉक्सो अधिनियम के तहत कोई भी प्राथमिकी जोनल डीसीपी की अनुमति के बिना दर्ज न किया जाए। हालांकि सर्कुलर पर आलोचना सामने आने के बाद पांडे ने शनिवार को कहा कि उसपर पुनर्विचार किया जा सकता है।
सोमवार को जारी किए गए सर्कुलर में कहा गया कि छेड़छाड़ या पॉक्सो अधिनियम के मामलों में एक सहायक पुलिस आयुक्त की सिफारिश और क्षेत्र के पुलिस आयुक्त की अनुमति मिलने के बाद ही प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए।
इस सर्कुलर को जारी करने के पीछे कारण बताया गया कि कई बार ऐसे अपराध झूठे मामले, संपत्ति, धन के विवाद या व्यक्तिगत झगड़ों के कारण दर्ज किए जाते हैं।
हालांकि, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने गुरुवार को इस आदेश को वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि यह यौन शोषण पीड़ितों के अधिकारों का उल्लंघन होगा। इसके बाद राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने अगले दिन पांडे को आदेश तुरंत वापस लेने को कहा।
मुंबई के पुलिस आयुक्त ने शनिवार को अपने निजी ट्विटर हैंडल से इस विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा, "पिछले हफ्ते व्यस्त रहा। कुछ मामलों की जांच के लिए हमारे सर्कुलर के बारे में कुछ गलतफहमी प्रतीत होती है। हमने दुरुपयोग को दूर करने की कोशिश की, लेकिन अगर बहुमत को लगता है तो हम निश्चित रूप से पुनर्विचार करेंगे।"
एक ट्विटर यूजर ने कहा कि सर्कुलर में बदलाव किया जा सकता है औऱ पुलिस तुरंत अपराध को दर्ज करना चाहिए और पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए भेजना चाहिए। यूजर ने कहा कहा, "तथ्यों का पता लगाने के बाद आप कानून के प्रावधान के अनुसार आरोपी को गिरफ्तार कर सकते हैं या नहीं कर सकते हैं। कृपया आरोपी को गिरफ्तार करने पर फिर से विचार करें।"
आयुक्त ने ट्वीट किया, "वास्तव में अगर कोई गलत अपराध दर्ज हो जाता है तो इसे बंद करना बहुत कठिन प्रक्रिया है और यही मुख्य कारण था। जांच का मतलब कभी भी दिन या सप्ताह नहीं था।"
उन्होंने कहा कि ज्यादातर मामलों में एसीपी, डीसीपी और वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक एक ही परिसर में कार्य करते हैं और शिकयात का सत्पान कुछ घंटों के भीतर किया जा सकता है।