दाऊदी बोहरा मुस्लिमों में बच्चियों के खतने की प्रथा रोकने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। दाऊदी बोहरा समुदाय ने कहा कि खतना उतनी गंभीर बात नहीं, जितना विरोधी बता रहे हैं। अगर सुरक्षा ही चाहते हैं तो डॉक्टरों को अस्पतालों में खतना करने के निर्देश दे दें। यह मांग नकारते हुए कोर्ट ने पूछा कि क्या इसका कोई वैज्ञानिक आधार है?
दाऊदी बोहरा समुदाय की ओर से सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि मुस्लिमों में दाऊदी बोहरा समुदाय सबसे प्रगतिशील और शिक्षित है। खतना धार्मिक रिवाजों का अहम अंग है। इस पर बेंच ने पूछा कि बच्चियों का खतना कैसे करते हैं? जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने पूछा कि आपका स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर क्या है? मैं तो उस बच्ची की पीड़ा के बारे में सोच रहा हूं, जो रोती-चिल्लाती इसका विरोध करती होगी। न बेहोशी की दवा और न ही अस्पताल।
बच्चियां दबोचकर रखी जाती हैं। इस पर सिंघवी ने कहा कि बच्चे को इंजेक्शन लगाते वक्त भी तो यही होता है। खतने में तो और भी सावधानी बरती जाती है, क्योंकि यह मां की देखरेख में होता है। बच्चियों के खतने की प्रथा उतनी गंभीर नहीं, जितना विरोधी बता रहे
खतने से कभी भरपाई न होने वाला नुकसान
इसी बीच, केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि खतने से बच्ची को कभी भरपाई न होने वाला नुकसान होता है। संविधान का अनुच्छेद 25 भी कहता है कि कोई धार्मिक रिवाज अगर पब्लिक ऑर्डर, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ है तो उसे बंद कर सकते हैं। अगली सुनवाई 9 और 10 अगस्त को होगी।