तिब्बत से निष्कासित होने का दुख उन्हे आज भी है लेकिन आज तिब्बत में चीन के दखल पर दलाई अलग ढ़ंग से सोचते हैं।बौद्ध धर्म गुरू ने कहा कि ‘दलाई लामा’ नाम की संस्था अब राजनीतिक रूप से प्रासंगिक नहीं है। यह फैसला तिब्बत के लोगों को करना है कि यह पुरानी परंपरा जारी रहनी चाहिए, या नहीं। तिब्बती आध्यात्मिक गुरू ने कहा कि चीन सरकार इस संस्था के बारे में राजनीतिक कारणों को लेकर उनकी तुलना में कहीं अधिक चिंतित है।
गौरतलब है कि तिब्बत के लोगों ने आध्यात्मिक गुरू को दलाई लामा की उपाधि दी है। यह उपाधि उन लोगों को दी जाती है जो गेलुग स्कूल के सर्वाधिक महत्वपूर्ण बौद्ध भिक्षुओं में एक माने जाते हैं। यह स्कूल तिब्बती बौद्ध मतावलंबियों का सबसे नया स्कूल है। चौदहवें दलाई लामा ने गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा, ‘1969 में ही मैंने औपचारिक रूप से यह बयान दिया था कि दलाई लामा की यह संस्था जारी रहनी चाहिए या नहीं, यह फैसला करना तिब्बत के लोगों पर निर्भर है।’
1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किए गए आध्यात्मिक गुरू ने करीब घंटे भर के संबोधन के बाद छात्रों के सवालों का जवाब देते हुए कहा, ‘मुझे कोई चिंता नहीं है। आजकल, चीन सरकार मेरी तुलना में कहीं अधिक चिंतित है। राजनीतिक कारणों को लेकर चीन सरकार चिंतित है।’ गौरतलब है कि 1959 में दलाई लामा भारत पलायन कर गए थे। दलाई ने कहा, ‘ 2011 में वह राजनीतिक जिम्मेदारी से पूरी तरह से मुक्त हो गए। अब निर्वाचित राजनैतिक नेतृत्व की पूरी जिम्मेदारी चीन निभा रहा है, मैं उनके फैसलों में शामिल नहीं होता।’’
भविष्य के दलाई लामा के बारे में उन्होंने कहा कि विभिन्न बौद्ध परंपराओं के सभी नेता नवंबर में तिब्बत में बैठक करते हैं। उन्होंने कहा, ‘इस नवंबर हम फिर से बैठक कर रहे हैं। पहले की बैठकों में उन लोगों ने यह फैसला किया था कि जब मैं करीब 90 साल का हो जाउंगा, तब नेताओं का समूह भविष्य के दलाई लामा के बारे में फैसला करेगा।’