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दलाई लामा हैं बौद्ध धर्म के 14वें गुरू, इस प्रक्रिया के तहत चुना जाता है अगला आध्यात्मिक गुरू

Sun, 22 Sep 2019 01:45 PM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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दलाई लामा (फाइल)
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तिब्बतियों के 14वें गुरू दलाई लामा की तबियत बिगड़ने के साथ ही नए दलाई लामा के चुनाव को लेकर चर्चा का दौर तेज हो गया है। एक बयान में दलाई लामा ने कहा था कि उनका उत्तराधिकारी कोई भारतीय भी हो सकता है। जहां चीन 15वें लामा के चुनाव को अपने अधिकार क्षेत्र में रखना चाहता है वहीं अमेरिका इसका विरोध कर रहा है। इसी बीच आज हम आपको बताते हैं कि कैसे दलाई लामा का चुनाव किया जाता है।

इस तरह ढूंढा जाता है नया उत्तराधिकारी

फिलहाल तेनजिन ग्यात्सो तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष और 14वें आध्यात्मिक गुरू हैं जो सभी का मार्गदर्शन करते हैं। लामा अपना जीवनकाल खत्म होने से पहले कुछ ऐसे संकेत देते हैं जिससे कि अगले लामा गुरू की खोज की जाती है। उनके शब्दों को समझते हुए ऐसे नवजात की खोज की जाती है जिसे कि अगला गुरू बनाया जा सके। यह खोज लामा के निधन के तुरंत बाद शुरू हो जाती है। 

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लामा के निधन के आसपास पैदा हुए बच्चों की खोज की जाती है। कई बार यह खोज सालों तक भी चलती है। तब तक कोई स्थाई विद्वान लामा गुरु का काम संभालता है। एक से ज्यादा बच्चों में भी मौजूदा लामा के बताए हुए लक्षण दिख सकते हैं। ऐसे में समय आने पर उनकी कठिन शारीरिक और मानसिक परीक्षाएं ली जाती हैं। जिसमें पूर्वलामा की व्यक्तिगत वस्तुओं की पहचान भी शामिल होती है।

पुरानी मान्यताओं को मानने से चीन का इनकार

यदि पहले से निभाई जा रही परंपराओं को एक तरफ कर दिया जाए तो फिलहाल यह साफ नहीं है कि अगले लामा का चुनाव किस तरह से होगा। चीन किसी भी पुरानी परंपरा को मानने से मना करता रहा है। वहीं मौजूदा लामा कह चुके हैं कि वह अपने जीवनकाल में अपना उत्तराधिकारी चुन सकते हैं या यह काम धर्मगुरुओं को सौंप सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह परंपरा से अलग होगा।

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1951 में चीन ने किया था तिब्बत पर कब्जा

बौद्ध धर्म के अनुयायियों की मानें तो वर्तमान लामा पहले के दलाई लामाओं के अवतार हैं यानी उन्हीं का पुनर्जन्म हुआ है। 1951 में चीन ने सैनिकों को भेजकर तिब्बत पर कब्जा कर लिया था। बेशक चीनी कब्जे के बाद तेनजिन ग्यात्सो को 14वें दलाई लामा के तौर पर पद पर बिठाया गया लेकिन उनका चुनाव 1937 में ही कर लिया गया था। उनके चुनाव से चीन बौखला गया और उसने उन्हें अपने यहां बिना किसी सुरक्षा गार्ड के आने का निमंत्रण दिया। 

जवाहरलाल नेहरू ने दी थी शरण

तिब्बतियों ने जब इस निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया तो उसने गोलीबारी का आदेश दे दिया। जिसके कारण पड़ोसी देश होने की वजह से केवल भारत की वहां राजनयिक पहुंच थी। तब 23 साल के दलाई लामा सेना की वर्दी पहनकर छिपते-छिपाते असम के रास्ते भारत आए थे। लामा 31 मार्च 1951 को भारत आए थे और  तीन अप्रैल को भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनके आने की घोषणा की थी। फिर उन्हें और उनके साथ आए लोगों को शरण देते हुए हिमाचल में रहने की इजाजत दी।
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