उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाने वालों के लिए यह राहत भरी खबर है कि सरकार शिकायतकर्ता ग्राहकों को नया विकल्प देने वाली है। इसके तहत ग्राहक शिकायत के निपटारे में मध्यस्थता का रास्ता अपना सकेगा। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने इस संबंध में दिशा-निर्देश तैयार कर लिए हैं, जिन्हें राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के पास मंजूरी के लिए भेजा गया है।
केंद्रीय मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक एनसीडीआरसी से दिशा-निर्देशों को मंजूरी मिलने के बाद ग्राहकों के लिए एक नया रास्ता खुल जाएगा। वह अपनी शिकायत के निपटारे के लिए किसी भी परिस्थिति में मध्यस्थता का रास्ता अपना सकेंगे, जबकि मौजूदा समय ऐसा कोई विकल्प शिकायतकर्ता के पास नहीं है।
मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक विभिन्न पहलुओँ पर विशेषज्ञों के साथ विचार करने के बाद यह सामने आया कि उपभोक्ता मामलों में मध्यस्थता का विकल्प जरूरी है। जब दोनों पक्ष समुचित सामाधान के लिए राजी हों तो फिर मामले को क्यों लंबा खींचा जाए। मौजूदा समय 4.30 लाख उपभोक्ता मामले लंबित हैं, जिनमें भी इस विकल्प से उपभोक्ता को राहत मिलेगी। आगामी 19 फरवरी को इस पर बैठक कर निर्णय लिया जाएगा।
मंत्रालय के अधिकारी ने बताया कि अगर मध्यस्थता विफल रहती है तो उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाने का विकल्प खुला रहेगा। दिशा-निर्देशों के मुताबिक दोनों पक्षों के बीच एक मध्यस्थ की नियुक्ति होगी।
उसका कार्य वाजिब पहलुओं का ध्यान रखकर दोनों के बीच निपटारा कराना होगा। खास बात ये है कि दिशा-निर्देश में जवाब देने, प्रति उत्तर दाखिल करने और निपटारे की अवधि निर्धारित है। इस दौरान वह साक्ष्यों और दस्तावेज की मांग कर सकेगा और उसे 21 दिन या तीन सप्ताह के भीतर मध्यस्थता की कार्यवाही पूरी करनी होगी।
हालांकि किसी पक्ष की ओर से मांग किए जाने पर 15 दिन अतिरिक्त समय मध्यस्थता के लिए दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि मध्यस्थता को साक्ष्य अधिनियम कानून का पालन करना होगा।
सरकार की ओर से उपभोक्ता मासलों पर कई कदम उठाए गए हैं जिनमें से एक उपभोक्ता अदालतों में लगने वाले शुल्क को घटाया जाना भी है। गौरतलब है कि सरकार ने पांच लाख रुपये तक के मामलों में वाद करना उपभोक्ताओं के लिए निशुल्क कर दिया गया है। जबकि 20 लाख रुपये तक का मुकदमा दायर करने के लिए अब उपभीक्ता को सिर्फ 400 रुपये का शुल्क रखा गया है।