गांधी पर किताबें इतनी छपीं जितनी पहले कभी नहीं छपी थीं। उसी तरह नरेन्द्र मोदी की महिमा में लिखी गई किताबों की संख्या भी कम नहीं रही। पिछले एक साल में ही छोटे बड़े प्रकाशकों ने मोदी के नाम पर सौ से ज्यादा किताबें छाप दीं। इन पुस्तक मेलों की यह भी एक बड़ी उपलब्धि कहिए कि इन्होंने लेखकों को भी वक्त के साथ चलना और बिकने की कला को समझना सिखाया है।
पिछले 30 सालों से एनबीटी से जुड़ी मौजूदा निदेशक नीरा जैन इसे एक बेहद उत्साहजनक आयोजन मानती हैं और कहती हैं कि जब हमने 1972 में इसकी शुरुआत की थी तो बहुत कम लोग आते थे। पहले ये मेला हर दूसरे साल होता था, लेकिन 2013 से हर साल होने लगा है। इसका दायरा दिल्ली से बढ़कर देश के तमाम शहरों तक पहुंच गया है। हर राज्य की राजधानियों में तो हर साल पुस्तक मेला लगता ही है, अन्य कई छोटे शहरों में भी इसकी पहुंच बढ़ी है।
मशहूर आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी कहते हैं कि साहित्यिक समारोहों जिसे लिट फेस्ट या लिटरेचर फेस्टिवल के नाम से जाना जाता है, वहां भी एक तरह से पुस्तक मेलों जैसा ही माहौल हो गया है, तमाम प्रकाशकों के स्टॉल्स वहां भी लगते हैं। खासकर इसके व्यावसायिक स्वरूप लेने और प्रायोजकों की जमात के शामिल हो जाने से किताबों का बाज़ार बढ़ा है और इसमें ग्लैमर एलिमेंट भी नजर आने लगा है। लेखक भी अब एक सेलिब्रिटी जैसा हो गया है। युवाओं में भी इन लिट फेस्ट की चमक दमक का असर दिखता है। ‘बेस्ट सेलर’ जैसे आकर्षक टर्म आ गए हैं और तमाम किताबें इस नाम पर खरीदी जाती हैं कि वो किसी बेस्ट सेलर लेखक या सेलिब्रिटी की हैं।
लेकिन ज्यादातर लेखक-प्रकाशक मानते हैं कि किसी बहाने सही, लेखकों की इज्जत तो बढ़ी, उनकी पहचान तो बनी और उनके लेखन पर चर्चा का मंच तो मिला। वरना आज जब मीडिया से साहित्य संस्कृति गायब है, लघु पत्रिकाओं की हालत खस्ता है, कोई व्यावसायिक साहित्यिक पत्रिका छापने की हिम्मत नहीं करता, ऐसे में पुस्तक मेले की यह संस्कृति बेशक एक संजीवनी की तरह है। निश्चित तौर पर लेखकों और प्रकाशकों के लिए यह एक स्वर्णिम युग जैसा है।