जवानों का मुख्यालय आना तो अब एक सपना सा हो गया है...
बता दें कि सात-आठ साल पहले सीआरपीएफ के पूर्व डीजी के. विजय कुमार ने अपने कार्यकाल के दौरान सीआरपीएफ मुख्यालय में प्रत्येक वीरवार को खुला दरबार लगाना शुरू किया था। इसमें कोई भी कर्मचारी या उनका परिवार अपनी बात रख सकता था।
इसके सार्थक नतीजे भी देखने को मिले थे। उनके जाते ही जब दिलीप त्रिवेदी ने डीजी का पदभार संभाला तो उन्होंने सबसे पहले यह खुला दरबार बंद कर दिया। इसके बाद अभी तक कई डीजी आए और चले गए, मगर किसी ने भी वह परंपरा दोबारा से चालू नहीं की।
पिछले साल जवानों को अपनी बात कहने के लिए मोबाइल एप शुरू किया गया है। बल के जवानों की कुल संख्या को देखें तो उसका पांच-दस फीसदी भी एप पर रेस्पांस नहीं आ रहा है। सीआरपीएफ के एक अधिकारी बताते हैं कि इसका कोई फायदा नहीं है।
कर्मचारी को पता है कि उसने अपनी परेशानी या किसी अफसर की शिकायत एप पर की है तो उसके खिलाफ किसी दूसरे बहाने से कार्रवाई होने में देर नहीं लगेगी। यदि किसी को डीजी से मिलना है तो उसकी राह बहुत मुश्किल है। अब नए आदेश में अफसरों के बल मुख्यालय जाने के नियम कठोर कर दिए गए हैं ऐसे में जवानों का यहां तक पहुंचने का सवाल ही नहीं उठता।
जवान को मुख्यालय जाने से पहले अपने डिप्टी कमांडेंट को आवेदन देगा, फिर वह टू-आईसी के पास से होता हुआ कमांडेंट तक पहुंचेगा। इसके बाद डीआईजी, आईजी और उसके बाद एडीजी या स्पेशल डीजी की टेबल से होता हुआ वह आवेदन डीजी तक पहुंचेगा। इनमें अगर किसी भी अफसर को लगता है कि कर्मचारी की शिकायत जायज नहीं है तो वह उसे रद्दी की टोकरी में फेंक सकता है।
पिछले कुछ दिनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं कि जिनमें जवानों और अफसरों को कथित तौर पर प्रताड़ित किया गया है। उनकी बातें जायज होते हुए भी वे बल मुख्यालय तक नहीं पहुंच सके।