इकराम हुसैन की कमान में ड्यूटी करने वाले सिपाही अरशद इकबाल और देबजीत बरूआ बहुत उदास हैं। ये दोनों अभी क्वारंटीन में हैं। काफी प्रयास करने के बाद ये दोनों फोन पर कुछ बोलने को तैयार हुए। दोनों का कहना था कि हमारे साहब जवानों का बहुत ख्याल रखते थे।
देबजीत बताते हैं कि दो सप्ताह पहले एक-दो जवानों को जब हल्की खांसी और जुखाम की शिकायत हुई, तो उस वक्त साहब चिंता में पड़ गए थे। साहब बोले, छोड़ो यार, कोई भी कोरोना की बात नहीं करेगा। पता नहीं, ये किसको ले बैठेगा। खतरनाक बीमारी है।
चूंकि उस वक्त कैंप में हम सब मौजूद थे तो हमने कहा, साहब जी, आप चिंता न करें। हम साथ हैं। हमने साहब को ही तसल्ली देनी शुरू कर दी। कुछ देर बाद इकराम साहब हंसे और बोले, मुझे डरा रहे हो। मैं तुम्हें चेक कर रहा था। ये मजाक था, जाओ ड्यूटी संभालो।
इकराम साहब ने बताया था कि मेरे दो लड़के हैं। एक असम पुलिस में भर्ती होने की तैयारी कर रहा है। मैं सोचता हूं कि दूसरा भी जॉब में हो जाए तो उनकी शादी कर दूंगा।
अरशद इकबाल बताते हैं कि हम ढाई माह से खजूरीखास और सीलमपुर जैसे इलाकों में तैनात रहे हैं। मंडोली जेल के अलावा दिल्ली दंगों के दौरान भी हम साहब के साथ रहे थे। हमारे साहब, मन से ड्यूटी देने वाले व्यक्ति थे। क्या धर्म और क्या जाति, ये सब बातें तो उनसे कोसों दूर थी।
हमारे साथ जितने भी हवलदार सिपाही रहे, वे सभी चाहते थे कि उनकी ड्यूटी इकराम साहब की कमान में लगे। अगर कोई ड्यूटी से इधर उधर हुआ या देर हो गई तो वे अफसर वाला रौब नहीं झाड़ते थे। पहले बैठाकर समझाते थे।
अगर किसी को सजा देनी होती तो बहुत मामूली सी, जिसका सामने वाले को पता भी नहीं चलता, मगर उसे गलती का अहसास जरूर हो जाता था। सबकी जरूरतों का ख्याल रखते थे। किसी को पांच-छह घंटे भी कहीं जाना होता, तो वे अपनी जिम्मेदारी पर उसे जाने देते थे। इकराम साहब...यकीन नहीं होता कि आज वे हमारे बीच में नहीं हैं।