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CRPF: सीआरपीएफ ने अपने ग्राउंड कमांडरों को मुख्य स्तंभ मानने से किया इनकार, कैडर अफसरों को बताया सुपरवाइजर

सार

CRPF News: बता दें कि बल के कैडर अफसर कई वर्षों से अपनी पदोन्नति के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। इस बाबत कई दफा कमेटी व बोर्ड गठित हो चुके हैं, मगर पदोन्नति की राह प्रशस्त नहीं हुई। कैडर अफसरों का कहना है, अगर हमें नियुक्ति के 15 वें साल में भी पदोन्नति नहीं मिल रही है तो बाकी बचे सेवाकाल का अंदाजा लगाया जा सकता है।
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सीआरपीएफ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' ने अपने ही ग्राउंड कमांडर यानी सहायक कमांडेंट को बल का मुख्य स्तंभ मानने से इनकार कर दिया है। इतना ही नहीं, दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष दाखिल किए गए एक जवाब में बल ने कैडर अफसरों की भूमिका को एक सुपरवाइजरी पोस्ट बताया है। सीआरपीएफ ने सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक के पांच रैंकों को मुख्य स्तंभ कहा है। इन्हें ही फोर्स की रीढ़ बताया है। कैडर अफसर तो इन रैंकों को सुपरवाइज करने के लिए होते हैं। इस जवाब ने उन ग्राउंड कमांडरों को गहरी चोट पहुंचाई है, जो 15 वर्ष में पहली पदोन्नति यानी 'डिप्टी कमांडेंट' का पद भी नहीं पा सके हैं। पदोन्नति व दूसरे आर्थिक फायदों के लिए कैडर अफ़सरों को विभिन्न अदालतों की शरण लेनी पड़ रही है। 
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बता दें कि बल के कैडर अफसर कई वर्षों से अपनी पदोन्नति के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। इस बाबत कई दफा कमेटी व बोर्ड गठित हो चुके हैं, मगर पदोन्नति की राह प्रशस्त नहीं हुई। कैडर अफसरों का कहना है, अगर हमें नियुक्ति के 15 वें साल में भी पदोन्नति नहीं मिल रही है तो बाकी बचे सेवाकाल का अंदाजा लगाया जा सकता है। ये अफसर जब भी शीर्ष अफसरों के समक्ष अपनी बात कहते हैं तो उन्हें अदालत में मामला होने की बात कह कर शांत कर दिया जाता है। समय पर पदोन्नति न मिलने के कारण अनेक युवा अफसर, सीआरपीएफ की जॉब छोड़ चुके हैं। इन अफसरों का कहना है कि जम्मू कश्मीर में आतंक रोधी ऑपरेशन या एलडब्लूई थियेटर में नक्सलियों की कमर तोड़ना और उत्तर पूर्व में उग्रवादियों से लोहा लेना, इन सब कामों में ग्राउंड कमांडरों की बड़ी भूमिका रहती है। वे केवल दफ्तर में बैठकर सुपरवाइज नहीं करते। अग्रिम मोर्चे पर अपने जवानों का नेतृत्व करते हैं। नतीजा, सीआरपीएफ में शौर्य चक्र सहित वीरता के दूसरे पदकों की सूची में कैडर अफसरों की संख्या देखी जा सकती है। 

2009 बैच के सहायक कमांडेंट प्रजीत सिंह (43 डीएजीओ) 138 बटालियन व अन्य ने दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष 3872/2013 के तहत अपनी याचिका में यह प्रार्थना की थी कि ग्रुप ए कैडर में पदोन्नति के लिए पद सृजित किए जाएं। इस मामले में अदालत ने याचिकाकर्ता को छह माह में विभाग को प्रतिवेदन देने के लिए कहा। उसके बाद विभाग अपना स्पीकिंग ऑर्डर जारी करेगा। प्रजीत सिंह ने सीआरपीएफ को अपना प्रतिवेदन दिया। इसमें कई बातें कही गई थी। जैसे सीएपीएफ के बाकी अफसरों की तरह सीआरपीएफ के कैडर अफसरों को माना जाए। ग्रुप ए कैडर में सभी बलों के अफसरों की पदोन्नति व आर्थिक फायदे एक समान हों।
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दूसरे बलों के समकक्ष सीआरपीएफ के कैडर अफसरों को भी पदोन्नति एवं दूसरे लाभ समय पर मिलें। परमोशन देने के लिए नए पदों का सृजन हो। याचिकाकर्ता की दलील थी कि सीएपीएफ ग्रुप ए के सभी अफसर यूपीएससी की कॉमन परीक्षा पास करने के बाद जॉब में आते हैं। ऐसे रिक्रूटमेंट रूल बनें, जिससे कि कमांडेंट स्तर तक समयबद्ध तरीके से पदोन्नति मिले। जिस तरह से सीआरपीएफ में डॉक्टरों को समयबद्ध पदोन्नति मिलती है, वैसे ही कैडर अफसरों को करियर में आगे बढ़ने का अवसर दिया जाए। उन्हें समय पर पे ग्रेडेशन मिले। डीओपीटी ने भी कहा है कि मिनिमम सेवा काल पूरा होने के बाद पे स्केल दिया जाए। सीआरपीएफ ने 25 अक्तूबर 2023 को एक स्पीकिंग ऑर्डर निकाला था। उसमें कहा गया कि सभी बलों का अलग रोल होता है। कोई भी दो अर्धसैनिक बल एक जैसे नहीं हैं। सभी बलों की ऑपरेशन क्षमता अलग है। उनकी नेचर ऑफ ड्यूटी अलग है। रिक्रूटमेंट रूल अलग हैं। सभी बलों में पदोन्नति के अवसर भी अलग हैं।
 
बल का कहना था कि सभी जगह पर एक रूल नहीं चल सकता। मेडिकल अफसरों को पदोन्नति में ज्यादा तव्वजो मिलती है, ये ठीक नहीं है। इस बाबत स्वास्थ्य मंत्रालय का अलग से आदेश है। कैडर अधिकारियों का तो वैकेंसी बेस्ड परमोशन होता है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि वे एक समान परीक्षा पास करने के बाद जॉब में आए हैं, तो ऐसे में सभी के पदोन्नति अवसर भी समान हों। विभाग का तर्क था, डीओपीटी के ओएम के अनुसार नियमों में बदलाव कर चुके हैं। विभाग ने यह भी कहा है कि पेटिशनर तो चार वर्ष की सेवा के बाद सीनियर टाइम स्केल मिल चुका है। इस संबंध में प्रजीत सिंह ने दलील दी कि वे अपना नहीं, बल्कि ग्रुप ए के सभी कैडर अधिकारियों के लिए पूछ रहे हैं। 

विभाग ने अपने जवाब में कहा, सीआरपीएफ का मुख्य रोल, लॉ एंड ऑर्डर और आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए है। इसमें मेन स्तंभ तो नॉन गजटेड एग्जीक्यूटिव कैडर होता है। इसमें सिपाही से इंस्पेक्टर तक की मुख्य भूमिका रहती है। फोर्स में 90 प्रतिशत रैंक तो इन्हीं के हैं। कैडर अफसर तो केवल इन्हें सुपरवाइज करने के लिए होते हैं। यही पांच रैंक फोर्स के पिलर हैं। यहां भी तो पदोन्नति की मारामारी है। 

राजपत्रित अधिकारी मेन पिलर नहीं हैं। विभाग ने अपने जवाब में लिखा, इनका यह क्लेम झूठा है कि ये ही फोर्स के मुख्य स्तंभ हैं। यह भी कहा गया कि रिटायरमेंट एज बढ़ने के साथ ही स्टेगनेशन भी बढ़ा है। प्रजीत सिंह बनाम भारत सरकार मामले में कैडर अफसरों ने बताया, बल ने अपना जवाब बहुत ही गैर जिम्मेदाराना तरीके से दाखिल किया है। सीआरपीएफ ने अदालत में अपने जवाब में जो तर्क दिया है, वह समझ से परे है। आईएएस और आईपीएस अधिकारी, वास्तव में अखिल भारतीय सेवाओं के सभी सदस्य मुख्य रूप से पर्यवेक्षक हैं, जबकि सीआरपीएफ अधिकारी, वास्तविक जमीनी स्तर पर बल का नेतृत्व करते हैं।

किसी भी ऑपरेशन को ग्राउंड कमांडर लीड करते हैं। पहली गोली या बारूदी सुरंग का शिकार भी वही होते हैं। कैडर अधिकारी मुख्य स्तंभ नहीं हैं, सीआरपीएफ ने यह कह कर ग्राउंड अफसरों को पीड़ा पहुंचाई है। किसी भी तरह से एनजीओ और जीओ की करियर संभावनाओं की तुलना एक समान मानदंडों से नहीं की जा सकती। सभी की अपनी जिम्मेदारी होती है। कैडर अधिकारियो के लिए की गई प्रतिकूल टिप्पणी से ग्राउंड कमांडरों में  रोष है। इसमें उनके त्याग, बलिदान, सेवा और संघर्ष, सबको कमतर आंका गया है।
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