सीआरपीएफ में सिपाही से लेकर कैडर अफसरों तक को पदोन्नति की मार से जूझना पड़ रहा है। हालत ऐसी हो चली है कि दुनिया की विशिष्ट फोर्स 'कमांडो बटालियन फॉर रिसोल्यूट एक्शन' (कोबरा) के लिए यंग प्रोफाइल वाले जवान और अफसर नहीं मिल पा रहे हैं। पहले इस फोर्स में जाने के लिए सिफारिश तक कराई जाती थी, अब वहां जाना एक मजबूरी बन गया है। बल मुख्यालय द्वारा मई के पहले सप्ताह में एक दर्जन से अधिक डिप्टी कमांडेंट रैंक के अफसरों को 'कोबरा' ज्वाइन करने का आदेश दिया है। साथ ही यह भी कह दिया है कि इन आदेशों को लेकर कोई डिप्टी कमांडेंट, अगर कोई प्रतिवेदन देना चाहे, तो उसे नहीं माना जाएगा। कोबरा में पर्याप्त वैकेंसी हैं, इसलिए उन्हें वहां ज्वाइन करना ही होगा। इनमें से ज्यादातर अधिकारी 40-45 वर्षीय हैं। घने जंगलों में कोबरा बटालियन की कंपनी को डिप्टी कमांडेंट ही लीड करते हैं। जानकारों का कहना है कि जहां 30-35 वर्षीय अधिकारी की जरुरत है, वहां 45 साल के डिप्टी कमांडेंट को भेजा जा रहा है। इन सबके पीछे समय पर पदोन्नति न मिलना एक बड़ी वजह है।
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तब हर किसी के लिए 'कोबरा' में नियुक्ति संभव नहीं थी
गत सप्ताह जो ट्रांसफर हुए हैं, उनमें एक दर्जन से अधिक डिप्टी कमांडेंट शामिल हैं। इस सूची में 38 वर्षीय एक डीसी, 39 वर्षीय एक डीसी, 41 वर्ष की आयु वाले चार डीसी, 42 वर्षीय तीन डीसी, 43 साल के चार डीसी, 44 वर्षीय एक डीसी और 45 वर्षीय एक डीसी का नाम लिखा है। आदेशों में यह भी लिखा है कि फोर्स की ऑपरेशनल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उक्त सूची पर किसी तरह का कोई विचार नहीं होगा। शारीरिक परीक्षा के बाद अधिकारियों को 'कोबरा' में ज्वाइन करना है। सीआरपीएफ से गत वर्ष स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले सहायक कमांडेंट सर्वेश त्रिपाठी बताते हैं, ये बहुत गंभीर स्थिति है। साल 2008 में जब कोबरा का गठन हुआ तो सबसे कम आयु वाले जवानों और अधिकारियों को ही वहां भेजा जाता था। इसके लिए बाकायदा परीक्षा होती थी। हर किसी के लिए 'कोबरा' में नियुक्ति संभव नहीं थी। 30 साल से ज्यादा आयु वालों को ही लिया जाता था। शुरू में सहायक कमांडेंट के लिए 30 वर्ष और डिप्टी कमांडेंट के लिए 35 वर्ष आयु निर्धारित की गई। उस वक्त पदोन्नति का संकट नहीं था। पांच-सात वर्ष में पदोन्नति के अवसर मिल जाते थे।
अब एसी को 15 तो सिपाही को 20 साल में पदोन्नति
बतौर सर्वेश त्रिपाठी, आज तो पदोन्नति को लेकर स्थिति बहुत ही खराब है। सहायक कमांडेंट तो 15 साल में भी डिप्टी कमांडेंट नहीं बन पा रहे हैं। अंदाजा लगा लें कि जो युवा 25 साल में 'एसी' भर्ती हुए, उन्हें डीसी बनने में कितना समय लगता होगा। जब ऐसा होगा तो फोर्स में यंग प्रोफाइल वाले अफसर कहां से आएंगे। पहले कोबरा में आने के लिए 'एसी' की आयु 30 साल रखी गई, अब वह 40 हो चुकी है। डीसी की आयु भी 35 से बढ़कर 45 तक पहुंच गई है। पहले जोश के साथ जवान/अफसर, कोबरा में आते थे। अब जबरदस्ती जैसी स्थिति है। ऐसे तो अग्निवीर की तर्ज पर कोबरा में 'यंग जांबाजों' की कल्पना साकार नहीं हो सकती। नक्सलियों के साथ मुकाबले में 45 वर्षीय अधिकारी को टीम लीड करने में शारीरिक और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ सकती हैं। सिपाही व हवलदार की बात करें तो यहां भी वैसी ही स्थिति है। इन्हें भी 20 साल में मुश्किल से पदोन्नति मिल रही है। नतीजा, पहले कोबरा में नाम डलवाते थे, अब हटवाते हैं। ऐसे में मनोबल भी टूटता है।
सीआरपीएफ में सिपाही से लेकर कैडर अफसरों तक को पदोन्नति की मार से जूझना पड़ रहा है। हालत ऐसी हो चली है कि दुनिया की विशिष्ट फोर्स 'कमांडो बटालियन फॉर रिसोल्यूट एक्शन' (कोबरा) के लिए यंग प्रोफाइल वाले जवान और अफसर नहीं मिल पा रहे हैं। पहले इस फोर्स में जाने के लिए सिफारिश तक कराई जाती थी, अब वहां जाना एक मजबूरी बन गया है। बल मुख्यालय द्वारा मई के पहले सप्ताह में एक दर्जन से अधिक डिप्टी कमांडेंट रैंक के अफसरों को 'कोबरा' ज्वाइन करने का आदेश दिया है। साथ ही यह भी कह दिया है कि इन आदेशों को लेकर कोई डिप्टी कमांडेंट, अगर कोई प्रतिवेदन देना चाहे, तो उसे नहीं माना जाएगा। कोबरा में पर्याप्त वैकेंसी हैं, इसलिए उन्हें वहां ज्वाइन करना ही होगा। इनमें से ज्यादातर अधिकारी 40-45 वर्षीय हैं। घने जंगलों में कोबरा बटालियन की कंपनी को डिप्टी कमांडेंट ही लीड करते हैं। जानकारों का कहना है कि जहां 30-35 वर्षीय अधिकारी की जरुरत है, वहां 45 साल के डिप्टी कमांडेंट को भेजा जा रहा है। इन सबके पीछे समय पर पदोन्नति न मिलना एक बड़ी वजह है।
तब हर किसी के लिए 'कोबरा' में नियुक्ति संभव नहीं थी
गत सप्ताह जो ट्रांसफर हुए हैं, उनमें एक दर्जन से अधिक डिप्टी कमांडेंट शामिल हैं। इस सूची में 38 वर्षीय एक डीसी, 39 वर्षीय एक डीसी, 41 वर्ष की आयु वाले चार डीसी, 42 वर्षीय तीन डीसी, 43 साल के चार डीसी, 44 वर्षीय एक डीसी और 45 वर्षीय एक डीसी का नाम लिखा है। आदेशों में यह भी लिखा है कि फोर्स की ऑपरेशनल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उक्त सूची पर किसी तरह का कोई विचार नहीं होगा। शारीरिक परीक्षा के बाद अधिकारियों को 'कोबरा' में ज्वाइन करना है। सीआरपीएफ से गत वर्ष स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले सहायक कमांडेंट सर्वेश त्रिपाठी बताते हैं, ये बहुत गंभीर स्थिति है। साल 2008 में जब कोबरा का गठन हुआ तो सबसे कम आयु वाले जवानों और अधिकारियों को ही वहां भेजा जाता था। इसके लिए बाकायदा परीक्षा होती थी। हर किसी के लिए 'कोबरा' में नियुक्ति संभव नहीं थी। 30 साल से ज्यादा आयु वालों को ही लिया जाता था। शुरू में सहायक कमांडेंट के लिए 30 वर्ष और डिप्टी कमांडेंट के लिए 35 वर्ष आयु निर्धारित की गई। उस वक्त पदोन्नति का संकट नहीं था। पांच-सात वर्ष में पदोन्नति के अवसर मिल जाते थे।
बतौर सर्वेश त्रिपाठी, आज तो पदोन्नति को लेकर स्थिति बहुत ही खराब है। सहायक कमांडेंट तो 15 साल में भी डिप्टी कमांडेंट नहीं बन पा रहे हैं। अंदाजा लगा लें कि जो युवा 25 साल में 'एसी' भर्ती हुए, उन्हें डीसी बनने में कितना समय लगता होगा। जब ऐसा होगा तो फोर्स में यंग प्रोफाइल वाले अफसर कहां से आएंगे। पहले कोबरा में आने के लिए 'एसी' की आयु 30 साल रखी गई, अब वह 40 हो चुकी है। डीसी की आयु भी 35 से बढ़कर 45 तक पहुंच गई है। पहले जोश के साथ जवान/अफसर, कोबरा में आते थे। अब जबरदस्ती जैसी स्थिति है। ऐसे तो अग्निवीर की तर्ज पर कोबरा में 'यंग जांबाजों' की कल्पना साकार नहीं हो सकती। नक्सलियों के साथ मुकाबले में 45 वर्षीय अधिकारी को टीम लीड करने में शारीरिक और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ सकती हैं। सिपाही व हवलदार की बात करें तो यहां भी वैसी ही स्थिति है। इन्हें भी 20 साल में मुश्किल से पदोन्नति मिल रही है। नतीजा, पहले कोबरा में नाम डलवाते थे, अब हटवाते हैं। ऐसे में मनोबल भी टूटता है।
2017 के बाद से कोबरा के प्रति अफसरों और जवानों का मोह भंग होने लगा है। पहले कोबरा में जाने के लिए आईजी तक से सिफारिशें आती थीं। तब वहां एक अलग पहचान थी, रिस्क अलाउंस भी ठीक था। पांच साल पहले आर1एच1 के तहत यह प्रावधान लागू हुआ कि एक ही इलाके में यदि कोबरा और सामान्य ड्यूटी वाले जवान तैनात हैं, तो उन्हें बराबर अलाउंस मिलेगा। उस वक्त कोबरा जवानों को अलग से 'कोबरा अलाउंस' मिलता था। यह सामान्य ड्यूटी देने वाले जवान या अधिकारी के लिए नहीं था। बाद में यह प्रावधान लागू कर दिया गया कि जोखिम वाले इलाके जैसे नक्सल प्रभावित जिले, वहां पर कोबरा और सीआरपीएफ की सामान्य ड्यूटी देने वालों को एक जैसा भत्ता मिलेगा। अफसरों को लगभग 25 हजार, तो जवानों को 17 हजार रुपये मिलने लगे। कोबरा में तैनात जवान/अफसर को कोई विशेष भत्ता नहीं मिल रहा। नेवी के मार्कोस कमांडो को जोखिम भत्ते के अलावा मार्कोस भत्ता अलग से मिलता है। सीआरपीएफ में अब कोबरा अलाउंस बंद कर दिया गया है। अब वहां तैनात सभी जवानों और अधिकारियों को रिस्क अलाउंस दिया जाता है। मतलब, कोबरा और सामान्य ड्यूटी वालों में कोई भेद नहीं रहा।
अलकायदा सरगना लादेन को मार गिराने वाले यूएस मरीन कमांडो बिना किसी मदद के जंगल में लगातार तीन रातों तक लड़ सकते हैं। दूसरी ओर कोबरा के हर जवान को ट्रेनिंग के दौरान सात दिन तक जंगल में लड़ने की परीक्षा पास करना जरूरी है। कई साल पहले कोबरा ने सारंडा (झारखंड) के घने जंगलों में 11 दिन तक बिना किसी मदद के एक बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया था। कोबरा यूनिट का गठन करने से पहले यूएस मेरिन कमांडो, उनकी ट्रेनिंग, वर्किंग स्टाइल, सर्जीकल स्ट्राइक और दूसरे कई तरह के ऑपरेशन की जानकारी ली गई। इन सबके बाद ही कोबरा यूनिट स्थापित हुई थी। यह विशिष्ट कमांडो फोर्स जंगल में बिना किसी मदद के डेढ़ सप्ताह तक लड़ सकती है। इसी वजह से विश्व में कोबरा की बेहतर रैंकिंग है। वजन लेकर जंगल में नियमित रूप से लड़ते रहने का रिकॉर्ड ब्रिटेन के विशिष्ट कमांडो दस्ते 'एसएएस' के नाम पर है। यह दस्ता 30 किलो वजन उठाकर दस रातें जंगल में गुजार सकता है, जबकि कोबरा 23 किलो वजन के साथ 11 रातों तक गहन जंगल से गुजरने में समर्थ हैं।