दिन में पहली बार सूरज निकला है। खुला-खुला मौसम मुझे और आशावादी बनाता है। सप्ताह में निराशानजक विचारों को पहली बार दूर भगाने में कामयाब हो पाया हूं। लेकिन हमारी दुकान में सामानों पर गर्द चढ़ती जा रही है। उनकी बिक्री नहीं हो पा रही है। अनगिनत घेरेबंदियों और आईएस के नाकों से होकर इन्हें लाने में इनकी कीमत बहुत ज्यादा हो गई है।
विज्ञापन
सीरिया डायरी: पहला हिस्सा
पिछले दो महीनों में जबसे आईएस ने इस इलाके पर कब्जा किया, उससे पहले के हफ्तों में हम अच्छी बिक्री कर लेते थे। कम बिक्री की वजह सिर्फ आसमान छूती कीमतें ही नहीं हैं, बल्कि लोग अब बाहर कम निकलने लगे हैं।
स्थिति को और बुरा बनाते हुए आईएस ने अभी हाल ही में सभी दुकानदारों को आदेश जारी कर, मुनाफे को 25 प्रतिशत तक सीमित करने को कहा है। इसके अलावा वे हमसे टैक्स भी वसूलते हैं। साफ सफाई और बिजली आदि का खर्च अलग है। असल में हमें घाटा हो रहा है। व्यापारी हताश हो रहे हैं।
विज्ञापन
डायरी का दूसरा हिस्साः '... पत्थर मार-मार कर औरत की जान ले लो'
आइएस
- फोटो : bbc
मैं चिंतित हूं, लेकिन तभी दुकान में आने-जाने वालों में से एक दोस्त की मां से मेरी मुलाकात हो जाती है। क्रांति की शुरुआत से ही वो हमारे साथ हैं। लेकिन जब आईएस ने कब्जा जमाया तो उसने सक्रियता छोड़ दी, शादी कर ली और गृहस्थी बसा ली।
बेचारा, उसे समझ नहीं आया कि वो अभी भी उसके पीछे पड़ सकते हैं। उसकी पहले की क्रांति से संबंधित गतिविधियों के बारे में आईएस को जानकारी थी और उन्होंने उसे कई बार गिरफ्तार भी किया था।
उसकी मां बहुत दुखी और निराश दिखती हैं। मैंने उनसे पूछा कि क्या बात है? उन्होंने बताया कि आईएस लड़ाकों ने घर पर छापा मारकर उनके बेटे को गिरफ्तार कर लिया है।
डायरी का तीसरा हिस्साः 'जो मारी गई, वो कुछ दिनों में मां बनने वाली थी'
आइएस
- फोटो : bbc
मैं उन्हें शांत करने की कोशिश करता हूं और कहता हूं कि वो शायद उससे पूछताछ कर रहे होंगे, जैसा पहले भी कई बार उन्होंने किया था। लेकिन उन्हें इस बात से तसल्ली नहीं मिली और उन्होंने मुझे शहर छोड़ देने की सलाह दी, इससे पहले कि वो मुझे भी पकड़ लें। उनके शब्द वाकई मेरे अंदर घर कर गए। मैं पास में गुजरते हुए टूटे दिलों को देखते हुए टूटे दिल के साथ शहर में घूमता हूँ।
पास से गुजरती हर एक जोड़ी आंखें अलग कहानी...अलग संघर्ष को बयां करती हैं। कुछ और दिन ऐसे ही गुजर जाते हैं। क़रीब दोपहर में अपनी दुकान के शेल्फ में मैं सामान रख रहा था, उसी समय एक पुराना दोस्त मुझसे मिलने आया।
डायरी का चौथा हिस्साः शरिया क्लास नहीं ली तो मिली सजा-ए-मौत
आइएस
- फोटो : bbc
वो थोड़ा घबराया लग रहा था और मुझे सलाह दी कि मैं इस शाम उस रास्ते से अपने घर न जाऊं जिससे अक्सर जाता हूं। उसने बताया कि रास्ते में कुछ ऐसा है जिसे शायद मैं न देखना चाहूं, हालांकि उसने बताया नहीं कि वो क्या है?
लेकिन अंत में इस उत्सुकता ने मुझे भी हैरान कर दिया। मेरे दोस्त के घर के सामने मैंने एक आदमी को देखा जिसका सिर काट दिया गया था। उसे सूली पर भी चढ़ा दिया गया था।
उसके सिर पर लिखा था, "एक जासूस, इस्लामिक स्टेट के दुश्मन का साथ देने वाला।" ये तो वही दोस्त था। मुझे विश्वास नहीं हुआ। मुझे इतना बड़ा झटका लगा कि मैं घर नहीं जा सकता था। मैं नहीं चाहता कि ऐसी स्थिति में मेरी मां मुझे देखे। ऐसा उन्होंने कैसे किया? उसकी मां के घर के सामने उसकी कटी हुई लाश को छोड़ देना? उसके परिवार के सामने?
मैंने फैसला कर लिया है कि अब मैं और नहीं झेल सकता। दिनों-दिन हालात और खराब होते जा रहे हैं। वो हर उस व्यक्ति के घर पर छापा मार रहे हैं, जिनका जरा सा भी क्रांति से संबंध था। भले ही इस बात को महीनों और सालों गुजर गए हों। मैं भी उन लोगों में से एक था। मैंने हर उस व्यक्ति से ख़ुद को दूर कर लिया जिनके साथ मैं प्रदर्शनों में जाया करता था। मैं नहीं चाहता था कि वो मुझ पर या उन पर संदेह करें। मैंने अब यहां से जाने का मन बना लिया है।
(अल-शरकिया 24 के एक्टिविस्ट आइएस की कथित राजधानी रक्का में रह रहे हैं। अल-शरकिया 24 आइएस के कब्जे वाले स्थानों के हालात के बारे में दुनिया को बताने के लिए काम कर रहे समूहों में से एक है। यह स्टोरी बीबीसी संवाददाता माइक थॉमसन से इस एक्टिविस्ट की लंबी बातचीत पर आधारित है।)