भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने उम्मीद जताई है कि अगले चार-पांच साल के भीतर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के साथ उसका एकीकरण हो जाएगा। जिन कारणों से 1964 में कम्युनिस्ट आंदोलन दोफाड़ हुआ था, उनमें से ज्यादातर अप्रासंगिक हो चुके हैं। यह कहना है भाकपा महासचिव सुरवरम सुधाकर रेड्डी का।
बकौल रेड्डी, दोनों वामपंथी पार्टियों को अब एक हो जाना चाहिए, नहीं तो दोनों को नुकसान उठाना पड़ेगा। देश में वाम आंदोलन मुश्किल दौर से गुजर रहा है। इसलिए, दोनों पार्टियों के एक ही तरह के काम में जुटे रहने का कोई तुक नहीं है। साथ मिलकर काम करेंगे तो बेहतर नतीजे आएंगे।
ऐसा नहीं है कि रातोंरात सब कुछ बदल जाएगा लेकिन इतना तय है कि इसके अच्छे परिणाम निकलेंगे। उम्मीद है कि अगले साल वामपंथी पार्टियों के सम्मेलन में एकीकरण पर चर्चा शुरू हो सकती है। हालांकि भाकपा महासचिव ने यह स्वीकार किया कि एकीकरण को लेकर अभी कोई सीधी बातचीत नहीं हुई है लेकिन माकपा के अंदर से इस बारे में सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं।
अभी दोनों पार्टियों के नेतृत्व में कोई वार्ता नहीं हुई है। एकीकरण में क्या बाधा है, इसके जवाब में रेड्डी कहते हैं कि इसका फैसला माकपा को करना है। ऐसा लगता है कि 1964 में पार्टी की टूट के पीछे के कुछ मुद्दों पर वे बातचीत करना चाहते हैं लेकिन वे सभी अब अप्रासंगिक हो चुके हैं।