एमएसएमई के कामगार खुश हैं। उन्हें लग रहा है कि घर बैठे तनख्वाह मिलनी है। दिल्ली के बवाना में छोटी सी फैक्टी चलाने वाले आरके गोयल और पटपडग़ंज में प्रिंटिंग का कारोबार करने वाले सतीश के पास इन दिनों रोज कर्मियों के फोन आ रहे हैं। फर्म के कर्मी तनख्वाह मांग रहे हैं और दोनों ही मालिकों की दशा इसके काबिल नहीं है कि किराया, बिजली का बिल, ईएमआई और कर्मियों को तनख्वाह दे पाएं। आरके बताते हैं कि उन्होंने 40 प्रतिशत तक अप्रैल की तनख्वाह दे दी है, लेकिन कर्मचारियों ने सीनियर कर्मी को सरकार का निर्देश याद दिलाना शुरू कर दिया है। सतीश और आरके का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी जी ने संदेश में कर्मियों को नौकरी से न निकालने, पूरी तनख्वाह देने के लिए कह दिया है। उनसे आगे मुख्यमंत्री केजरीवाल चले गए हैं। फर्म के कर्मी अभी खुशफहमी में जी रहे हैं कि चाहे जैसे हो लाला घर बैठने पर भी पूरी तनख्वाह देगा। यह वैसे ही हालात हैं जैसे कर्मियों में नोटबंदी के दौरान पैदा हो गए थे। तब भी छोटे तबके लग रहा था कि लाला जी फंस गए। अब फिर लग रहा है कि लाला जी खिलाएं। घर बैठने पर भी खिलाएं।
गड़करी जी को नहीं पता कि प्रधानमंत्री क्या करने वाले हैं?
पिछले 15 दिन से केन्द्रीय एमएसएमई मंत्री नितिन गड़करी एमएसएमई इंटरप्राइजेज के लोगों को सरकार से राहत मिलने का आश्वासन दे रहे हैं। पिछले दिनों गड़करी जी महाराष्ट्र के एमएसएमई से वीडियो कांफ्रेसिग के जरिए चर्चा कर रहे थे, तब भी आश्वासन दिया था कि केन्द्र की मोदी सरकार उनके साथ है। जल्द ही घोषणा होने वाली है। उन्होंने प्रधानमंत्री से चर्चा कर ली है। दिल्ली के कई लोग गड़करी से गाहे-बेगाहे चर्चा कर लेते हैं। उनके पास भी गड़करी का इसी तरह का आश्वासन है। अब लोगों का सब्र का बांध टूटने लगा है। सीआईआई के एक सीनियर पदाधिकारी तो यहां तक कहने लगे हैं कि लगता है कि गड़करी जी प्रधानमंत्री की गुडबुक से ही बाहर हैं। गड़करी जी आश्वासन को दे देते हैं, लेकिन फैसला कब होगा पता नहीं।
अमित भाई से बात हो गई
अमित भाई (शाह) से बात हो गई है। भाजपा के कई बड़े नेताओं और केन्द्रीय मंत्रियों से आप इस वाक्य को सुन सकते हैं। उ.प्र. के एक बड़े भाजपा नेता हैं। इनके पास भी अमित भाई का आश्वासन है। बताते हैं संगठन का फेर बदल होगा तो उन्हें बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी। उन्होंने बिना किसी परवाह के बताया कि जेपी नड्डा जी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, लेकिन भाजपा तो अमित भाई ही चला रहे हैं। बिना अमित भाई के भाजपा में पत्ता तक नहीं हिलता। प्रयागराज से संघ के पुराने कार्यकर्ता की दिल्ली आने की छटपटाहट बढ़ रही है। वह उ.प्र. संगठन में जिम्मेदारी चाहते हैं। उन्हें लग रहा है कि सुनील बंसल तब तक नहीं सुनते, जबतक अमित शाह जी न कह दें। बताते हैं कि उनका यह काम नड्डा जी से भी नहीं बनेगा। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के नेताओं से कहकर देख लिया है। अब बस गृहमंत्री जी से मिलने पर ही सब ठीक होगा।
राहुल नहीं...फ्रंट पर सोनिया को रहना होगा
कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी राजनीति में फिर फ्रंट पर खेलते नजर आ रहे हैं। राहुल गांधी के खेल को देखकर भाजपा के रणनीतिकारों ने फिर उन्हें नासमझ साबित करने की कोशिश शुरू कर दी है। लेकिन यह कोशिश केवल भाजपा ही नहीं कर रही है। विपक्ष के कई नेताओं को लग रहा है कि राहुल के आगे बढ़कर खेलने का फायदा प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को मिल जाएगा। बसपा के एक बड़े नेता का कहना है कि राहुल गांधी के अभियान में आक्रमकता और जल्दबाजी रहती है। राष्ट्रीय जनता दल के पटना में लालू प्रसाद यादव के उम्रदराज नेता का कहना है कि राहुल में वह बात नहीं है, जो सोनिया में है। विपक्ष के नेताओं की छोडि़ए, कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व महासचिव का भी कहना है कि फ्रंट पर सोनिया जी को ही रहना पड़ेगा। उनके पास कम से कम नेताओं की बात पहुंच तो जाती है। राहुल के पास अभी सोनिया जी जैसा मैकेनिज्म डेवलप नहीं हो पाया है।
सचिन पायलट भी कमाल के खिलाड़ी हैं
राजस्थान चलिए। गुलाबी शहर जयपुर की तफरी लेते हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार कोविड-19 संक्रमण से निबट रही है। मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियोकांफ्रेसिंग में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अशोक गहलोत की तारीफ क्या की, गहलोत की पार्टी में टीआरपी काफी बढ़ गई। बताते हैं प्रधानमंत्री की इस बारीक राजनीतिक पहल को कांग्रेस अध्यक्ष की टीम ने पलक झपकते ही भांप लिया। बताते हैं सचिन पायलट को भी बहुत कुछ भांपते देर न लगी। जवाब में पायलट ने अपने मीडिया प्रबंधन को और धार दे दी। वह पहले से भी ज्यादा टीवी चैनल, समाचार पत्र में आने लगे। सचिन पायलट राजस्थान के डिप्टी सीएम जरूर हैं, लेकिन यह कोई संवैधानिक पद तो है नहीं। अशोक गहलोत से उनका प्रतिस्पर्धी रिश्ता है। इसे गहलोत भी समझते हैं। गहलोत जहां सचिन को उभरने का अवसर नहीं दे रहे हैं, वहीं सचिन अपनी काबिलियत से उनसे भी कहीं ज्यादा मीडिया में छाए रहते हैं। कांग्रेस पार्टी भी खुश है कि चलो युवा नेता उत्साही है। इस बहाने राजस्थान में विपक्ष नेपथ्य में है।
कैलाश बाबू चैन से नहीं बैठते
मध्यप्रदेश में कैलाश विजयावर्गीज। पर्दे के पीछे से मुकाबला सीधे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से है। शिवराज सिंह चौहान खुद को मध्यप्रदेश के लोगों का मामा बताते हैं। विजयावर्गीज की टीम अपने नेता को म.प्र. के लोगों का भाई बताती है। शिवराज सिंह चौहान सशरीर, मय आत्मा भोपाल और म.प्र. तक सीमित रहते हैं। जबकि भाई कैलाश का एक पैर पश्चिम बंगाल में, दूसरा मध्यप्रदेश रहता है। आत्मा दिल्ली के पॉवर गलियारे में घूमती रहती है। शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश का चौथी बार मुख्यमंत्री बनने में सफल हो गए तो कैलाश विजयावर्गीज शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल का संक्षिप्त गठन और उसे बैलेंस कराने की रणनीति में सफल हो गए। अब दोनों की अंदरुनी लड़ाई मंत्रिमंडल के विस्तार में है। अभी 29 मंत्रियों की शपथ होनी है। 7-8 मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थकों के लिए चाहते हैं। बचे 22, कैलाश विजयावर्गीज की टीम चाहती है कि 22 में मंत्री जो भी बने शिवराज के खेमें के नेता कम रहें। बाकी आप खुद समझ गए होंगे।
कर्नाटक ने मजदूरों को क्यों रोका?
कर्नाटक में मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा का राज है। सब जानते हैं कि येदियुरप्पा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करीबियों में हैं। दोनों नेताओं की पहले से केमिस्ट्री है। तभी 75 वर्ष को काफी पहले पार कर चुके येदियुरप्पा का अब भी सिक्का चल रहा है। येदियुरप्पा गरीब, मजदूरों के पलायन पर नाराज हो गए। अनुभवी येदियुरप्पा जानते हैं कि गरीब, मजदूर पलायन कर गए तो कारोबार से लेकर उद्योग तक ठप हो जाएगा। इस पर एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री और भाजपा नेता ने कहा कि इसकी वजह कुछ और भी हो सकती है। पूछने पर पता चला कि येदियुरप्पा परिवार रीयल स्टेट में रुचि लेता है। रीयल स्टेट असंगठित मजदूरों के बूते चलता है। जब सब चले जाएंगे तो बचेगा क्या?