भारत और अमेरिका दोनों देशों के स्वास्थ्य अधिकारियों ने कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लोगों को कपड़े से बने मास्क पहनने की सलाह दी है। इस वक्त दुनिया मास्क पहनने को लेकर दो भागों में बंट गई है, ये कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
एक तरफ वो लोग हैं जो सार्वजनिक तौर पर मास्क पहनते हैं, दूसरी ओर वो हैं जो मास्क की क्षमता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। हालांकि भारत में चेहरा ढंकने की परंपरा पुरानी है। देश के लोग मौसम के कारण यह काम बहुत पहले से करते आ रहे हैं, हमारे लिए चेहरा ढंकना कोई नई बात नहीं है।
मशहूर डिजाइनर रितु कुमार ने बताया कि भारतीय लोग हमेशा से ही तीन तरह के पोशाक पहनते थे। एक ऊपर के हिस्से के लिए, दूसरे निचले हिस्से के लिए और एक सिर को ढंकने के लिए, जो चेहरा ढंकने के भी काम आता है।
उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र का कार्ले गुफा, जो दो ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी का है, उसमें एक चित्र है जिसमें महिला और पुरुष तीन तरह के कपड़े पहने हुए दर्शाए गए हैं। उन्होंने कहा कि शहर की महिलाएं भी अपने दुपट्टे का इस्तेमाल चेहरा ढंकने के लिए करती रही हैं।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन अहमदाबाद की डिसप्लिन लीड, टेक्सटाइल डिजाइन स्वाति सिंह घई ने कहा कि पुरुष भी बाहर जाने पर गमछा का इस्तेमाल चेहरा ढंकने के लिए करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि खेत में काम करने वाले किसान और अन्य लोग भी धूल, गर्मी और उमस से बचने के लिए चेहरा ढंकने के लिए अपने साथ कपड़ा रखते हैं। उन्होंने कहा कि गुजरात के कच्छ जिले के व्यपारियों का अपने कंधे पर एक कपड़ा लेकर चलना आम बात है।
कॉस्ट्यूम डिजाइनर संध्या रमन ने बताया कि संस्कृत साहित्य में महिलाओं द्वारा बड़े पैमाने पर घूंघट और दुपट्टा के इस्तेमाल करने का वर्णन है। वहीं कुछ समुदायों में हिजाब की भी परंपरा है और आजकल तो स्टोल और स्कार्फ का जमाना है।
उन्होंने कहा कि हाथ और पैर धोकर घर के अंदर जाना और फिर खाना खाना यह हमारी काफी पुरानी परंपरा रही है। इन सभी का संबंध भी स्वच्छता से ही है ताकि धूल, संक्रमण और अन्य चीजों को बाहर रखा जाए।