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'बाबरी के लिए कोर्ट तो तीन तलाक पर क्यों नहीं?'

Tue, 18 Apr 2017 01:01 PM IST
amarujala.com- submitted by: आनंद
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इन दिनों हमारे देश में तीन तलाक के खिलाफ मुसलमान औरतों की मुहिम जोरों से चल रही है। कई औरतें तीन तलाक पर रोक की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं। अलग अलग शहरों एवं कस्बों से किस्से आ रहै हैं जहाँ मुसलमान औरतें खड़ी होकर तीन तलाक या एक तरफा जुबानी तलाक से मुकाबला कर रहीं हैं। नकाब या बुर्के में छुपे कई चेहरे आज मीडिया में आ रहै हैं जो सब अपनी अपनी आपबीती सुना रहै हैं और इंसाफ की मांग कर रहै हैं।
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स्वतंत्र भारत में हम एक तारीखी मकाम पर हैं जहाँ देश के सबसे वंचित और सबसे पिछड़े समूहों में से एक समूह - यानि की मुसलमान औरतें आज अपने अधिकार और इंसाफ के लिए लड़ रही हैं। वे कुरान में लिखे अपने अधिकार और साथ ही साथ संवैधानिक अधिकार भी मांग रही हैं। वे सवाल पूछ रही हैं कि जब पवित्र कुरान में तीन तलाक नहीं है तो फिर हम तीन तलाक क्यों सहें?

वे सर्वोच्च न्यायलय एवं सरकार से कानून एवं सुरक्षा की अपेक्षा कर रही हैं। यहाँ संक्षिप्त में कहना जरुरी है की पवित्र कुरान के मुताबिक अल्लाह ने औरत और मर्द में भेदभाव नहीं किया है। मुसलमानों के लिए शादी एक सामाजिक करार है जहाँ दोनों पक्ष के बराबर हक एवं जिम्मेदारियां हैं। तलाक को एक निंदनीय एवं बुरी चीज कहा गया है। साथ है साथ कई आयातों में तलाक का स्पष्ट तरीका भी दर्शाया गया है। यहाँ पति-पत्नी में परस्पर बातचीत, संवाद एवं परिवार वालों की मध्यस्थता की बात कही गयी है।
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तीन तलाक पूरी तरह से गैर इस्लामी है

ये भी कहा गया है कि सुलह की कोशिश कम से कम 90 दिनों तक होनी चाहिए और अगर ये विफल रहे तो फिर न्यायपूर्ण तरीके से तलाक हो सकता है। जाहिर है कि एक-तरफा जुबानी तलाक या तीन तलाक पूरी तरह से गैर इस्लामी है। इसी लिए भारत में शिया समाज में एवं अनेक मुस्लिम देश में तीन तलाक कानूनी नहीं माना जाता। इतना ही नहीं जेंडर जस्टिस इस्लाम का एक बुनियादी असूल है और जाहिर है की तीन तलाक की इजाजत हरगिज नहीं है।

इसके बावजूद पितृसत्ता और रुढ़िवादी मानसिकता के चलते हमारे समाज में तीन तलाक होता आया है। पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे पुरुषवादी इदारे इसे सही ठहराते आए हैं। जबकि मजहब एवं मानवता दोनों ही की रौशनी में ये सही नहीं है। इस सिलसिले में प्रधान मंत्री की राय महत्वपूर्ण है। हाल ही में देश के प्रधानमंत्री ने कहा कि मुसलमान औरतों को तीन तलाक से छुटकारा मिलना लाजमी होगा।

प्रधानमंत्री के इस बयान के कई दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र है। हमारे संविधान में सामाजिक न्याय, महिला समानता एवं लिंग आधारित भेदभाव को लेकर स्पष्ट प्रावधान हैं। आर्टिकल 13, 14, 15 में हर महिला नागरिक के लिए न्याय और समानता की बात कही गयी है।

आर्टिकल 25 हर नागरिक को धर्म स्वातंत्र्य का अधिकार देता है

साथ ही साथ आर्टिकल 25 हर नागरिक को धर्म स्वातंत्र्य का अधिकार देता है। ये अधिकार महिला एवं पुरुष दोनों को ही बराबर दिया गया है। इसकी जिम्मेदारी सरकार और न्यायलय की है। इन्हीं प्रावधानों के तहत हमने सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक को खत्म करने के लिए याचिका दायर की है। हमें सुप्रीम कोर्ट से न्याय की पूरी उम्मीद है। मुसलमान औरतों को न्याय दिलवाना सरकार का संवैधानिक दायित्व है।

यही वजह है की सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को पक्ष बनाते हुए उसकी राय मांगी है जिसके जवाब में सरकार ने तीन तलाक को नाबूद करने की बात कहते हुए हलफनामा दायर किया है। यानि प्रधानमंत्री एवं संसद दोनों ही की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वे मुसलमान औरतों को न्याय मुहैया करवाएं। उधर दूसरी तरफ पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक को बरकरार रखने के लिए मुहीम छेड़ रखी है।

अपने पितृसत्तात्मक रवैये के चलते उनसे किसी को और कोई उम्मीद भी नहीं है। कोड ऑफ कंडक्ट के नाम पर उन्होंने कोई नई बात नहीं कही है बल्कि अपनी पुरुष प्रधान सोच को एक बार फिर से सामने रखा है। और फिर जब औरतों ने खुद अपना देशव्यापी आन्दोलन खड़ा किया है तब उसके दबाव में बोर्ड हरकत में आया है वरना तो उन्होंने औरत की मुश्किल के बारे में बात करना कभी जरुरी नहीं समझा।
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पर्सनल लॉ बोर्ड एक प्राइवेट संस्था है, ना की कोई अधिकृत एजेंसी

उनका कहना है की सरकार को या कोर्ट को मजहबी मामले में दखल नहीं देना चाहिए। वे भूल गए हैं की दर्जनों मुसलमान औरतों ने खुद कोर्ट के दरवाजे खटखटाए हैं! सुप्रीम कोर्ट के अलावा देश भर में अनेक फैमिली कोर्ट में एवं हाई कोर्ट में कई मुकद्दमे चल रहे हैं। फिर पर्सनल लॉ बोर्ड एक प्राइवेट संस्था मात्र है, ना की कोई अधिकृत एजेंसी। उन्हें जमीनी हकीकत से कोई लेना देना नहीं है; वरना वे रातोंरात तलाक के नाम पे बेघर और बेसहारा होनेवाली औरतों से यूँ मुह न मोड़ लेते।

बोर्ड के रवैये से कौम एवं मजहब दोनों की बदनामी हो रही है। फिर उनके नजरिए में दोगलापन साफ झलकता है; बाबरी मस्जिद विवाद में वे सुप्रीम कोर्ट का फैसला चाहते हैं लेकिन तीन तलाक के मामले में ये "दखल" हो जाता है। अगर ये सही होता तो हमारे देश में सती प्रथा के खिलाफ कानून, हिन्दू विवाह कानून, दहेज विरोधी कानून इत्यादि कानून न बने होते। लेकिन बोर्ड का तथ्यों से कोई लेना देना नहीं है ना ही सच्चाई या तर्क से।

हैरत है कि वे 2017 में भी मुसलमानों की आवाज होने का दावा करते हैं। मुसलमान औरतों को सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिलना ही चाहिए। साथ ही संसद को चाहिए कि हिन्दू कोड एवं ईसाई कानून या पारसी कानूनों की तरह ही एक मुस्लिम पारिवारिक कानून बनाए ताकि मुसलमान औरतों को अपने कुरानी एवं संविधानिक अधिकार प्राप्त हों और मजहब के नाम पर उन्हें पुरुषवाद का शिकार न होना पड़े।

( ये लेखिका के निजी विचार हैं। जकिया भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संस्थापक सदस्यों में एक हैं।)


 
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