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Sudan Crisis: एक जोड़ी पोशाक के साथ वापस लौटी, कीमती सामान छीन लिया, पढ़ें लोगों की आपबीती

Fri, 28 Apr 2023 05:57 AM IST
Jeet Kumar एजेंसी, चेन्नई।

सार

सोफिया ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा, मैं गर्भवती हूं। हमने सोचा था कि संघर्ष एक दो दिनों में समाप्त हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हमारा घर अर्धसैनिक प्रमुख के कार्यालय के करीब स्थित था। मेरी कार, डॉलर और अन्य कीमती सामान छीन लिया गया। 
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सूडान में सड़कों पर सैन्य बल - फोटो : Social Media
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विस्तार
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सूडान से लौटे भारतीय वहां जारी संघर्ष में अपना सब कुछ गंवाकर भारत लौट रहे हैं। उनका सारा धन और कीमती सामान यहां तो वहां पर छूट गया या छीन लिया गया।

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सूडान से चेन्नई लौटीं आईटी प्रोफेशनल दिव्या राजशेखरन ने कहा, वह सूडान से लौटने की सभी उम्मीदें खो चुकी थीं। अब मेरे पास केवल एक जोड़ी पोशाक और पासपोर्ट ही शेष है।  बीते आठ वर्षों में उन्होंने सूडान की जो छवि संजोई थी, वह पिछले 15 दिनों में ध्वस्त हो गई। बचाने में मदद के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को धन्यवाद। वे संघर्ष ग्रस्त सूडान से निकाले गए नौ तमिलों के पहले जत्थे में शामिल थीं। वे मदिपक्कम की रहने वाली हैं। 

उनके साथ लौटीं सोफिया ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा, मैं गर्भवती हूं। हमने सोचा था कि संघर्ष एक दो दिनों में समाप्त हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हमारा घर अर्धसैनिक प्रमुख के कार्यालय के करीब स्थित था। मेरी कार, डॉलर और अन्य कीमती सामान छीन लिया गया। 
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आगे कहा कि संघर्ष के आठवें दिन हम खानाबदोश बन गए। सौभाग्य से भारतीय दूतावास उनसे और वहां फंसे अन्य भारतीयों से संपर्क कर उन्हें नई दिल्ली ले आया। हमारे पास न तो वहां भोजन था और न ही पानी। हमने दही, चावल और अचार खाकर किसी प्रकार गुजारा किया। 

मर के वापस आ गया, अब कभी नहीं जाऊंगा
हरियाणा के सुखविंदर सिंह सूडान से बचकर आने के बाद इस पूरे घटनाक्रम को ऐसे याद करते हैं, लग रहा था मानो हम सभी मौत की शय्या पर हों। हम एक ही इलाके में एक कमरे में बंद थे। पेशे से इंजीनियर सुखविंदर सिंह सबसे पहले भारत पहुंचने वाले 360 लोगों के बैच का हिस्सा हैं। 

दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा पर उतरने के बाद पत्रकारों से बातचीत में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के फैक्टरी मजदूर छोटू कहते हैं, मर के वापस आ गया। अब मैं कभी सूडान नहीं जाऊंगा। टर्मिनल 3 पर उतरने के बाद अपना सामान और बच्चों को उठाए लोग बाहर आते दिखे। यहां इन सभी के चेहरे पर राहत के भाव थे। पंजाब के होशियारपुर के तसमेर सिंह (60) कहते हैं, ऐसा लग रहा था मानो हम सभी मर चुके हों। छोटे से घर में बिना बिजली-पानी के टिके हुए थे। हमें सूडान में ऐसे संघर्ष की आशंका नहीं थी। 
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सैन्य बलों ने दरवाजे पर दस्तक दी और ले गए कार 
दिव्या ने कहा, संघर्ष शुरू होने पर सैन्य बलों ने दरवाजे पर दस्तक दी। उन्होंने हिम्मत जुटाकर दरवाजा खोला। उनसे पूछा गया कि क्या वे भारतीय हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। उन्होंने उनसे भोजन, पानी और पैसा मांगा और उनकी कार ले गए।

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