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भ्रष्टाचार मामला: SC ने यदियुरप्पा की याचिका से जुड़े कानूनी सवालों को बड़ी पीठ के पास भेजा, फैसला रोका

Mon, 21 Apr 2025 08:12 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा नेता बी.एस. येदियुरप्पा की याचिका से उठे कानूनी सवालों को बड़ी पीठ को भेज दिया, जिनमें प्रमुख सवाल यह है कि मजिस्ट्रेट द्वारा जांच का आदेश देने के बाद भी भ्रष्टाचार निवारण कानून की धारा 17A के तहत सरकारी मंजूरी जरूरी है या नहीं।
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सुप्रीम कोर्ट, बी.एस. येदियुरप्पा - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भाजपा नेता बी.एस.येदियुरप्पा की याचिका से पैदा हुए कानूनी मुद्दों को बड़ी पीठ के पास भेज दिया। इनमें एक सवाल यह भी शामिल है कि मजिस्ट्रेट कोर्ट के जांच के आदेश के बाद भ्रष्टाचारा निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा के लिए पूर्व मंजूरी जरूरी होती है या नहीं। 
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क्या हुआ शीर्ष कोर्ट में?
जस्टिस जे.बी.पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ जब येदियुरप्पा की याचिका पर फैसला सुनाने की तैयारी कर रही थी, तभी उन्हें पता चला कि ऐसा ही एक मुद्दा पहले ही सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ द्वारा बड़ी पीठ को भेजा जा चुका है। इसलिए,उन्होंने फैसला सुनाने से खुद को रोक लिया, ताकि न्यायिक मर्यादा बनी रहे।

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कोर्ट ने क्या कहा?
शीर्ष कोर्ट ने कहा, हमने 4 अप्रैल को इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा था। लेकिन जब हम फैसला तैयार कर रहे थे, तब हमें 16 अप्रैल, 2024 का एक आदेश मिला, जिसमें इसी तरह का मामला पहले ही बड़ी पीठ को भेजा जा चुका है। इसलिए, न्यायिक अनुशासन बनाए रखने के लिए हमने तय किया कि इस याचिका को भी उसी मामले के साथ जोड़ दिया जाए। अब मामला चीफ जस्टिस (सीजेआई) के पास भेजा जाएगा ताकि उचित आदेश दिया जा सके।

मामला क्या है?
आलम पाशा नाम के व्यक्ति ने कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा, पूर्व मंत्री मुरुगेश निरानी और शिवास्वामी केएस के खिलाफ भ्रष्टाचार और साजिश का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज की थी। आरोप था कि इन लोगों ने देवनहल्ली औद्योगिकी क्षेत्र में 26 एकड़ जमीन आवंटन को रद्द कराने के लिए फर्जी दस्तावेज़ तैयार किए। 2013 में हाईकोर्ट ने इस शिकायत को 'अनिवार्य सरकारी मंजूरी न होने' की वजह से खारिज कर दिया था। लेकिन जब ये सभी पद से हट गए, तो 2014 में पाशा ने फिर से शिकायत दर्ज करवाई।

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सुप्रीम कोर्ट ने किन सवालों को उठाया?
1. क्या दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 156(3) (जहां मजिस्ट्रेट पुलिस जांच का आदेश देता है) के बाद भी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत सरकारी मंजूरी जरूरी है?
2. मजिस्ट्रेट के आदेश और सरकार की मंजूरी में क्या फर्क होता है?
3. जब मजिस्ट्रेट दिमाग लगाकर जांच का आदेश दे चुका हो, तब क्या मंजूरी की जरूरत 'बेमतलब' हो जाती है?
4. क्या मजिस्ट्रेट बिना मंजूरी के सीआरपीसी की धारा 200 और 202 के तहत शुरुआती जांच कर सकता है?

सुप्रीम कोर्ट इस समय यह तय कर रहा है कि जब कोई लोक सेवक (सरकारी अफसर/नेता) पर भ्रष्टाचार का आरोप लगे, तो जांच शुरू करने के लिए सरकारी मंजूरी कब जरूरी होती है। चूंकि यह कानूनी सवाल काफी जटिल है और एक जैसे कई मामलों में उठ चुका है, इसलिए इसे अब बड़ी पीठ को सौंपा गया है, ताकि एक स्पष्ट फैसला आ सके।

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