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सार्स और मर्स में कारगर रही थी प्लाज्मा थेरैपी.. जानें इसके बारे में सबकुछ

Wed, 29 Apr 2020 03:09 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली।
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प्लाज्मा थेरैपी - फोटो : social media
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दुनियाभर में इस वक्त प्लाज्मा थेरैपी से कोरोना मरीजों पर शोध किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने भी इसे इलाज नहीं माना है। शोध के नतीजे भले ही ठोस व प्रामाणिक न हों लेकिन स्पेनिश फ्लू, स्वाइन फ्लू, सार्स और मर्स में यह काफी कारगर रही थी। पेश है प्लाज्मा थेरैपी से जुड़े ऐसे ही तमाम सवाल-जवाब...  

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क्या है प्लाज्मा
प्लाज्मा खून का तरल और पारदर्शी भाग होता है। यह हल्का पीला होता है। यह 92 फीसदी तक पानी से मिलकर बना होता है। रक्त का 55 फीसदी हिस्सा प्लाज्मा ही होता है।

क्या है प्लाज्मा थेरैपी
जब इंसान किसी रोगाणु के संपर्क में आता है तो शरीर उसे खत्म करने के लिए एंटीबॉडी बनाता है। ये एंटीबॉडी प्लाज्मा में भी मिलती हैं। जब मरीज संक्रमण से ठीक हो जाता है, तब ये एंटीबॉडी कुछ समय तक प्लाज्मा में मौजदू रहती हैं। कई दफा आपकी एंटीबॉडी दूसरे में फैले संक्रमण से भी लड़ सकती हैं। 
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क्या पहले भी हुआ है इस्तेमाल
डॉक्टरों ने 1918 में स्पेनिश फ्लू के अलावा स्वाइन फ्लू, सार्स और मर्स के मरीजों के लिए भी इस तकनीक का उपयोग किया। जब इंसान खुद एंटीबॉडी विकसित करता है या वैक्सीन से दी जाती है तो उसे एक्टिव इम्युनिटी कहते हैं। कॉन्वलेसेंट प्लाज्मा के जरिये एंटीबॉडी डालने को पैसिव इम्युनिटी कहा जाता है। यह तकनीक दूसरा पुख्ता इलाज उपलब्ध न होने पर की जाती है। दुनियाभर में इतने बड़े पैमाने पर पहली दफा इस्तेमाल हो रहा है। इस तकनीक का इस्तेमाल ट्रॉमा और कैंसर में भी किया जाता है। 
 

क्या यह कोविड में कारगर है

कोविड-19 के लिए पहली बार इस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। इसलिए इसका पुख्ता उत्तर इतनी जल्दी नहीं दिया जा सकता है क्योंकि दुनियाभर में अभी इससे इलाज चल रहा है। कई मरीजों में सुधार हुए हैं, लेकिन ऐसे भी मामले कम नहीं हैं, जब यह प्रभावी नहीं रही। लिहाजा, इससे कितनी बड़ी तादाद में मरीज ठीक होते हैं, इसका उत्तर आगामी कुछ माह में ही मिलेगा।

प्लाज्मा दान सुरक्षित है? क्या इसमें दर्द होता है
यह रक्तदान जैसी ही प्रक्रिया है। इसमें डेढ़ से दो घंटे लगते हैं। प्लाज्मा दान करने वालाें की पहले स्क्रीनिंग होती हैं। दानकर्ता की बांह की नस में रक्त निकालने के लिए सुई डाली जाती है। बैग में रक्त निकालने की बजाय इसे एक मशीन में लिया जाता है। जहां प्लाज्मा को रक्त से अलग किया जाता है। साथ ही रक्त वापस दानकर्ता को चढ़ा दिया जाता है।

यह प्रक्रिया तब तक दोहराई जाती है, जब तक पर्याप्त मात्रा में प्लाज्मा एकत्र नहीं हो जाता। एक बार में दो से चार यूनिट प्लाज्मा लिया जाता है। आपके शरीर में एक-दो दिन में फिर से उसका निर्माण हो जाता है। इस पूरी प्रक्रिया का कोई खास साइड इफेक्ट नहीं होता है। 
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आप ठीक हुए हैं तो कैसे करें प्लाज्मा दान

सबसे पहले तो आपका पिछले कम से कम 14 दिनों से संक्रमण मुक्त होना जरूरी है। फिर जिस भी नजदीकी अस्पताल में प्लाज्मा लिया जा रहा है, वहां संपर्क साधें। फिर वहां बुनियादी जरूरतें पूरी होने पर प्लाज्मा दे सकते हैं। 

क्या मैं भी दान कर सकता हूं
मुझे कोरोना के लक्षण थे पर अब ठीक हो गया हूं पर कभी जांच नहीं कराई। क्या मैं भी प्लाज्मा दान कर सकता हूं। वैश्विक स्तर पर लक्षण आने पर कोविड-19 की जांच जरूरी है। फिर संक्रमण मुक्त होने के कम से कम 14 दिन बाद ही रक्त दान कर सकते हैं।  

और शोध की जरूरत 
प्लाज्मा थेरैपी पर पहले शोध की जरूरत है। सभी संस्थानों के लिए जरूरी है कि वे शोध के लिए आईसीएमआर और ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया से मंजूरी लें। शोध के लिए इन संस्थानों के दिशानिर्देशों का पालन करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि विश्व स्तर पर इस पर बेहद कम अध्ययन हुए हैं। -रणदीप गुलेरिया, निदेशक एम्स दिल्ली

थेरैपी प्रभावी है, रोकें नहीं
मंत्रालय का यह कहना कि कोविड-19 के उपचार के रूप में प्लाज्मा थेरैपी के प्रभावी होने के कोई साक्ष्य नहीं है, गलत है। वैश्विक डाटा का आकलन करें तो यह जीवन बचाने में प्रभावी साबित हुआ है। कृपया कोविड-19 के खिलाफ प्लाज्मा थेरैपी का इस्तेमाल नहीं रोकें। -किरण मजूमदार शॉ, संस्थापक बायोकॉन
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