विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से 30 मई को जारी कोरोना वायरस की वैक्सीन से संबंधित ड्राफ्ट के अनुसार दुनियाभर में 121 वैक्सीन प्री क्लीनिकल स्टेज में हैं। इन 121 वैक्सीन में से छह भारत की हैं। इन्हें भारत की अलग-अलग दवा कंपनियों ने तैयार किया है। इसमें जाइडस कैडिला हेल्थकेयर की दो वैक्सीन हैं।
इसके साथ भारत बायोटेक ग्रुप की विदेशी कंपनियों के साथ मिल कर बनाई गई दो वैक्सीन भी प्री क्लीनिकल स्टेज में हैं। इंडियन इम्युनोलॉजिकल्स लिमिटेड की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी की साझेदारी में एक वैक्सीन और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की कोडेजेनिक्स के साथ मिलकर बनाई वैक्सीन प्री क्लीनिकल स्टेज में है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) हैदराबाद के शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि उन्होंने कोविड-19 की जांच के लिए किट विकसित की है, जिससे महज 20 मिनट में नतीजे आ जाएंगे। शोधकर्ताओं ने दावा किया कि उनके द्वारा विकसित कोविड-19 जांच किट मौजूदा समय में इस्तेमाल किए जा रहे रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पॉलिमरेस चेन रिएक्शन (आरटी-पीसीआर) पर आधारित नहीं है।
उन्होंने कहा कि किट 550 रुपये की कीमत पर विकसित की गई है और बड़े पैमाने पर उत्पादन होने पर इसकी कीमत 350 रुपये तक हो सकती है। शोधकर्ताओं ने जांच किट के पेटेंट के लिए आवेदन किया है और हैदराबाद स्थित ईएसआईसी चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल में नैदानिक परीक्षण चल रहा है है एवं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) से मंजूरी मांगी गई है।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने कोविड-19 से प्रभावित आबादी के अनुपात को समझने के लिहाज से सीरो-सर्वे के लिए इस्तेमाल होने वाली आईजीजी एलिजा किटों की विधिमान्य सूची जारी की है। आईजीजी एलिजा किट कोरोना वायरस के लिए पहली स्वदेशी एंटीबॉडी जांच किट हैं। रक्त सीरम में विशेष तत्वों का पता लगाने के लिए सीरो-सर्वे जांच की जाती है।
डालमिया समूह की कंपनी डालमिया हेल्थकेयर ने विभिन्न आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों को लेकर बनायी गयी दवा ‘आस्था-15’ के कोविड-19 के इलाज में उसकी उपयोगिता और प्रभाविता का पता लगाने के लिए क्लीनिकल परीक्षण शुरू किया है।डालमिया हेल्थकेयर ने कहा है कि उसे क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री (सीटीआर) से इसकी मंजूरी मिल गयी है और तीसरे चरण के परीक्षण के लिए सभी नियामकीय दिशानिर्देशों का पालन किया जाएगा।
समूह की अनुसंधान एवं विकास इकाई डालमिया सेंटर फॉर रिसर्च एंड डेवलपमेंट (डीसीआरडी) गहन शोध के बाद 15 औषधियों का एक ‘पॉलीहर्बल कॉम्बिनेशन’ बनाया, जिसे आस्था-15 का नाम दिया गया है। डालमिया ग्रुप ऑफ कंपनीज के चेयरमैन संजय डालमिया ने कहा, 'हम अपने अत्यधिक प्रभावशाली आयुर्वेदिक मिश्रण का मानवों पर परीक्षण कर रहे हैं। यह कोविड-19 के मरीजों का इलाज करने में मदद कर सकता है।'
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित संजय गांधी आर्युविज्ञान संस्थान के मॉलीक्यूलर मेडिसिन एंड बॉयो टेक्नोलाजी विभाग के वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस के संक्रमण का पता लगाने के लिए विशेष तकनीक विकसित की है, जिसमें 30 मिनट में जांच संभव होगी और इस पर खर्च भी कम आएगा। विभाग की प्रमुख प्रो. स्वास्ति तिवारी का कहना है कि इस आरएनए आधारित त्वरित जांच किट पर पांच सौ रुपये से ज्यादा का खर्च नहीं होगा।
तकनीक के पेटेंट के लिए आवेदन कर दिया है और अगर एसजीपीजीआई व आईसीएमआर से हरी झंडी मिल गई तो तीन से चार माह में यह सुविधा उपलब्ध हो जाएगी। यह तकनीक आरएनए आधारित है, यानि मरीज के नमूने से आरएनए निकाल कर उसमें ही संक्रमण देखा जाएगा। अभी तक विदेश से आयातित किट पर जांच चल रही है, जिसमें चार से पांच हजार का खर्च आता है और तीन से चार घंटे का समय लगता है।
आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने प्लास्टिक की बेकार बोतलों का इस्तेमाल करके एक उच्च दक्षता वाले मास्क बनाने के लिए एक तकनीक विकसित करने का दावा किया है। शोधकर्ताओं का दावा है कि इस तकनीक के जरिये बनाए जाने वाले इस तरह के मास्क से व्यावसायिक रूप से उपलब्ध मास्क की तुलना में न केवल आसानी से सांस ली जा सकती है बल्कि इसे 30 बार तक धोकर फिर से उपयोग किया जा सकता है।
आईआईटी मंडी की टीम ने ‘इलेक्ट्रोस्पिनिंग’ पर आधारित इस तकनीक के लिए पेटेंट भी दाखिल किया है। सहायक प्रोफेसर, सुमित सिन्हा रे के अनुसार, एन 95 स्तर के मास्क बनाने के लिए प्लास्टिक की बेकार पड़ी बोतलों का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने कहा, ‘प्रयोगशाला पैमाने पर, मास्क के लिए सामग्री की लागत लगभग 25 रुपये प्रति मास्क थी। वाणिज्यिक विनिर्माण स्तर के दौरान, इसकी लागत लगभग आधी हो जाएगी।’