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कोविड के आइने में दास्तान-ए लापरवाहीः पनामा-न्यूयार्क से दिल्ली तक

Sun, 29 Mar 2020 11:04 AM IST
देव कश्यप संजय देव, नई दिल्ली

सार

  • पनामा से चले थे 21 मार्च को अंतिम फ्लाइट से
  • न्यूयार्क एयरपोर्ट पर थी ढिलाई-लापरवाही
  • मुंबई एयरपोर्ट पर और बढ़ी बदइंतजामी, लापरवाही
  • अंतरराष्ट्रीय यात्री दिल्ली पहुंच हो गए डोमैस्टिक, इमिग्रेशन अटका
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कोरोना वायरस - फोटो : PTI
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विस्तार
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पनामा सिटी से बीते शनिवार यानी 21 मार्च को भारत के लिए चलने वाली अंतिम उड़ान से न्यूयार्क होकर दिल्ली पहुंचने वाले भारतीय आईटी पेशेवर प्रियदर्शी की कहानी कोरोना को लेकर सतर्कता के अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय प्रावधानों में बरती जा रही ढिलाई, छलावे और भुलावे की सटीक दास्तां है।

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प्रियदर्शी की इस यात्रा से यह भी समझ में आ जाता है कि अमेरिका में सोशल डिस्टेंसिंग पर कितनी गंभीरता है। मुंबई-दिल्ली के हवाई अड्डों पर कैसी सतर्कता है और कैसी अफरातफरी का माहौल है। साथ ही, विमानन कंपनियों की सतर्कता की भी कलई खुल जाती है। प्रियदर्शी जब पनामा से न्यूयार्क पहुंचे तो वहां कोरोना से संबंधित कोई चेकिंग नहीं हो रही थी। उनकी यह ट्रांजिट फ्लाइट थी। प्रियदर्शी ने पनामा और न्यूयार्क एयरपोर्ट पर देखा कि मात्र 20 फीसदी लोगों ने मास्क लगाए थे।

न्यूयार्क से भारत आने वाली फ्लाइट एयर इंडिया की थी। यहां पर फ्लाइट में बैठने जा रहे भारतीयों में से 95 फीसदी ने मास्क पहने थे। न्यूयार्क एयरपोर्ट पर सोशल डिस्टेंसिंग का कोई ख्याल नहीं था। अराइवल हॉल में 500 से अधिक लोग थे। इमिग्रेशन की कार्रवाई के बाद तक न्यूयार्क एयरपोर्ट पर प्रियदर्शी का कोरोना संबंधी कोई चेकअप नहीं हुआ। वहां से दिल्ली एयरपोर्ट से 22 मार्च की सुबह 5 बजे तक की उथल-पुथल कथा सुनिए प्रियदर्शी की ही जुबानी।
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इमिग्रेशन के बाद मैंने एयर इंडिया के काउंटर से दिल्ली का बोर्डिंग पास हासिल किया। अमेरिका के अलहदा प्रांतों से आए हुए तमाम भारतीय इस फ्लाइट से भारत आने के लिए जमा थे। न्यूयार्क से भारत आने वाली यह भी अंतिम फ्लाइट थी। इस बोइंग विमान (फ्लाइट नंबर ए.आई. 144) से हमें 21 मार्च को मुंबई होते हुए दिल्ली आना था। अधिकतर यात्रियों ने मास्क पहने थे और विमान के भीतर साफ-सफाई का अच्छा हाल न देखकर सबने अपनी सीट-ट्रे-बेल्ट आदि को खुद सेनेटाइज किया। मुंबई में अधिकतर यात्रियों को उतरना था और मेरे समेत 18 को दिल्ली तक आना था। हम सभी को 21 मार्च को दिन में 12 बजे मुंबई एयरपोर्ट पर उतारा गया।

शुरू हुआ दुर्दशा का  सिलसिला
हम दिल्ली वाले यात्रियों ने पूछा कि हमारा बोर्डिंग पास और सीट नंबर दिल्ली तक वैध है। बिना कोई स्पष्टीकरण दिए एयर इंडिया वालों ने सभी को उतार लिया। उतरने पर मुंबई में स्वास्थ्य मंत्रालय की आई.डी.एस.पी. टीम ने सभी 18 का मेडिकल परीक्षण तापमान जांच कर किया। मुंबई वालों ने टेस्टिंग की प्रक्रिया ठीक से पूरी नहीं की। हमें एक फार्म (दो कॉपी) भरने के लिए दिया गया जिसमें मेरी श्रेणी सी लिखी थी। मुझे बाद में पता चला कि  इसका मतलब होम क्वारंटीन होता है।

शाम 5 बजे उसी फ्लाइट से हमें दिल्ली के लिए उड़ान भरनी थी। पर हमें बताया गया कि आपको दूसरी फ्लाइट से दिल्ली भेजा जाएगा। जिस फार्म को हमने दो कॉपी में भरा था, उसकी एक ही कॉपी हमें दी गई, एक मुंबई वालों ने रख ली। उनकी इस गलती के लिए हमें बाद में दिल्ली में काफी दिक्कतें उठानी पड़ीं। हमें बताया गया कि इमिग्रेशन दिल्ली में होगा। जब हमारी अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट मुंबई में ही समाप्त हो गई तो इमिग्रेशन की प्रक्रिया वहीं होनी चाहिए थी। एयरपोर्ट अधिकारियों ने गलती की। यहीं से घालमेल का तमाशा शुरू हुआ जिसे हमने दिल्ली जाकर भुगता।

शाम 5 बजे चलने वाली हमारी फ्लाइट का समय हो गया रात के 9 बजे और इसमें कई फ्लाइटों के यात्रियों को एडजस्ट कर दिया गया क्योंकि यात्री कम थे। कोरोना के हालात में यह कितना सही था, यह देखने की बात है। मुंबई एयरपोर्ट पर उस दिन खाने के लिए कुछ नहीं था, एयर इंडिया ने भी कोई व्यवस्था नहीं की थी। बार-बार कहने के बाद भी एयरलाइंस ने खाने की तो बात ही क्या, पानी की एक बोतल तक हमें उपलब्ध नहीं कराई। नौ बजे हम फ्लाइट में बैठ गए। हमारा न्यूयार्क से दिल्ली वाला बोर्डिंग पास ले लिया गया और हमें मुंबई से दिल्ली का नया बोर्डिंग पास दिया गया था। अब हम डोमैस्टिक फ्लाइट के यात्री हो गए। इस गड़बड़ी की गंभीरता का पता हमें दिल्ली पहुंच कर चला। दिल्ली के इमिग्रेशन पर हमारे पास ऐसा कुछ भी साबित करने को नहीं था जो उनके सिस्टम में भी दिखाए कि हम न्यूयार्क से आए थे। हमारा बोर्डिंग पास तो मुंबई से दिल्ली का था। और हमारी फ्लाइट उतरी भी डोमैस्टिक टर्मिनल पर।

इंटरनेशनल यात्रियों को डोमैस्टिक बना कर दिया रवाना
यहां से हमारी दुर्दशा की नई कहानी शुरू हुई। एयर इंडिया मुंबई ने अपने दिल्ली के समकक्षों को और दिल्ली की एयरपोर्ट अथारिटी को इस बारे में कोई सूचना नहीं दी कि इस फ्लाइट में न्यूयार्क से आने वाले 18 भारतीय भी हैं। मुंबई से दिल्ली आने वाले और मुंबई से न्यूयार्क (दिल्ली होकर) जाने वाले  यात्री तो इसमें थे ही। फ्लाइट दिल्ली में डोमैस्टिक टर्मिनल पर उतरी। इमिग्रेशन का काउंटर तलाशते हम लगेज बैल्ट तक पहुंच गए। मैंने सवाल उठाया कि बिना इमिग्रेशन के सामान हमें कैसे मिल रहा है तो एयर इंडिया के ग्राउंड ड्यूटी स्टाफ के एक बिष्ट जी ने कहा कि आप सामान लेकर जा सकते हो। हमारे आपत्ति जताने पर उन्होंने साथियों से बात की तो उनके बैगेज सेक्शन से एक व्यक्ति आए और मामला ‘समझ’ कर बोले कि कोई दिक्कत नहीं, आप सभी 18 लोग सामान लेकर घर चले जाइए।

हमने फिर जिद की कि हमारा इमिग्रेशन मुंबई में तो हुआ नहीं और वहां के एयर इंडिया स्टाफ ने कहा था कि आप लोगों की इमिग्रेशन प्रक्रिया दिल्ली में होगी। हमारा इमिग्रेशन कराइए या फिर हमें लिख कर दीजिए कि हम घर जाएं। उनके हीला-हवाली करने पर सभी 18 को इकट्ठा करके मैंने समझाया कि हमें अब मिलकर पुलिस को बताना चाहिए और एफआईआर करके उसकी कॉपी लेनी चाहिए। यह सुनकर बिष्टजी सकपकाए और बोले कि आप अपनी पासपोर्ट दीजिए, मैं पता करके आता हूं और आप लोग अपना लगेज कन्वेयर बैल्ट से उठा लीजिए तबतक।

बिष्टजी बोले, वापस मुंबई जाना पड़ेगा
लौटकर उन्होंने कहा कि आप सबको तो मुंबई ही जाना पड़ेगा, इमिग्रेशन तो वहीं होगा और हमारी डोमैस्टिक फ्लाइट कल सुबह ही है मुंबई के लिए। तब मैंने कहा कि आप हमें तुरंत मुंबई भेजो और इमिग्रेशन करवा कर उसी जहाज से वापस लाने की व्यवस्था करो, यह आपकी ही जिम्मेदारी है। तबतक हमें पनामा से चले 40 घंटे हो चुके थे, हम सब थकान और परेशानी के थपेड़ों से त्रस्त थे। ऐसी हालत हो रही थी कि गिर ही पड़ेंगे।

तय किया कि हमें पीछे से लेकर जाएंगे एयर इंडिया वाले और घुमाकर इंटरनेशनल काउंटर पर लाएंगे और इमिग्रेशन करवा देंगे। हमसे अपना अपना सामान फिर से कन्वेयर बेल्ट पर डाल आने को कहा गया, वैसा ही किया। इस बीच सीआईएसएफ के अफसर ने आकर आपत्ति जताई। आखिरकार एयर इंडिया वालों ने कई स्तरों पर क्लीयरेंस ली- एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया, इमिग्रेशन सुपरिन्टेन्डेंट, कस्टम सुपरिन्टेन्डेंट और सीआईएसएफ सुपरिन्टेन्डेंट। यह सब करते करते 22 फरवरी की भोर पूर्व के 2.30 बज गए। यहां से हमें सामान के साथ वे लोग बस से एयरपोर्ट के भीतर ही बस से इंटरनेशनल टर्मिनल पर लाए। वहां से हम बाहर निकले तो मेडिकल चेकअप वाली टीम से सामना हुआ। हमारे मेडिकल के लिए टीम के इंचार्ज की जरूरत थी और वह उस समय वहां थे नहीं। बताया गया कि आठ बजे आएंगे।

हद दर्जे की लापरवाही की मुंबई वालों ने
हमारे पास मुंबई में हुए मेडिकल चेकअप का एक ही फार्म था, यह भी गलत किया था उन लोगों ने। आखिरकार दिल्ली की मेडिकल टीम ने किसी तरह उस एक ही फॉर्म से हमें बाहर किया। इसी दौरान यह भी पता चला कि हमारे साथ जो एक बुजुर्ग दम्पति थे, मुंबई में चेकअप के दौरान उन्हें बी-कैटेगरी दी गई थी और बाकी सबको सी-कैटेगरी। इसका मतलब था कि बाकी सबको 14 दिन होम क्वारंटीन में रहना था और बुजुर्ग दम्पति को अस्पताल में 14 दिन क्वारंटीन में। कायदे से बी और सी कैटेगरी वालों को एकसाथ यात्रा भी नहीं करनी थी। मुंबई की मेडिकल टीम की लापरवाही हद दर्जे की थी। उनकी इस गलती का हश्र यह हुआ कि दिल्ली आते-आते हम सब भी तकनीकी तौर पर बी-कैटेगरी के हो गए। इतना ही नहीं, उस फ्लाइट में बैठे वे लोग भी जो न्यूयार्क जा रहे थे, वे भी बी-कैटेगरी हो गए। एयर इंडिया वालों ने हद दर्जे की लापरवाही की थी सबको एकसाथ बैठाकर—बी और सी कैटेगरी वालों के साथ ही सामान्य यात्रियों को भी बैठाकर सभी को बी-कैटेगरी का बना दिया उन्होंने।

इमिग्रेशन के सिस्टम में फ्लाइट डिटेल थी ही नहीं
इमिग्रेशन वालों को किसी तरह मना कर हमने अपना काम कराना चाहा। इमिग्रेशन वालों के सिस्टम में हमारी फ्लाइट तो आ नहीं रही थी क्योंकि वो तो डोमैस्टिक थी। फिर से वहां बात करके उस फ्लाइट की डिटेल सिस्टम में डलवा कर हमारा दिल्ली में इमिग्रेशन हुआ और हमें किसी तरह 22 मार्च को सुबह 3.30 बजे मुक्ति मिली। इनसानों को तो मिली लेकिन हमारा लगेज तो डोमैस्टिक के कन्वेयर बैल्ट पर कैद था, वह हमें 2-3 दिन बाद ही मिलेगा— ऐसा बताया गया। हम 18 लोगों ने फिर हाथ-पांव जोड़े, किसी को देहरादून जाना था, एक को धर्मशाला। फिर कस्टम वालों से अनुमति लेकर हमारा सामान भी हमें दिलाया गया। यहां से बाहर निकले तो कोविड-19 की टीम ने घेर लिया, साथ में दिल्ली पुलिस वाले थे। उन्होंने कहा कि हम आपका पूरा मेडिकल टेस्ट करेंगे, हमारी मेडिकल बस आएगी, उसी में आपके पूरे टेस्ट होंगे। तभी आप लोग यहां से निकल सकेंगे। मेडिकल अफसर और हमारी बस 8 बजे आएंगे। टेस्ट के बाद तय होगा कि आपको छावला सेंटर भेजना है कि होम क्वारंटीन की अनुमति देनी है। अबतक 4 बज चुके थे।फिर अटक गए हम और निराश से होकर बैठ गए। आखिरकार हमारे हाल पर पसीज कर उन्होंने हमें होम क्वारंटीन की बातें समझा कर 5 बजे के करीब छोड़ दिया। मैं अब गुड़गांव में होम क्वारंटीन में हूं।

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