कोरोना वायरस का असर हर क्षेत्र पर पड़ता दिख रहा है। अन्नदाता भी इससे अछूता नहीं रहा। कोरोना वायरस के चलते हुए लॉकडाउन से किसानों की मुसीबतों में इजाफा हो गया है। गेहूं की फसल कटने के लिए तैयार है, लेकिन खेत-मजदूर नहीं मिल रहे। लॉकडाउन शुरू होने से पहले अधिकांश मजदूर अपने घरों को चले गए।
बता दें कि हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और दूसरे कई राज्यों में गेहूं की कटाई का सीजन शुरू हो रहा है। जिन किसानों के पास दो-तीन एकड़ जमीन है, वे मजदूरों से ही गेहूं कटवाते हैं। इसकी वजह ये है कि उन्हें पशुओं के लिए सालभर का चारा भी चाहिए।
अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक सरदार वीएम सिंह के अनुसार, कोरोना के चलते जो लॉकडाउन हुआ है, उसमें मजदूर कहां से आएंगे। अगर कोई मजदूर बाहर निकलता है तो उसे पुलिस के डंडे खाने पड़ते हैं। जिन किसानों के पास पशुधन है, वह कंबाइन से गेहूं नहीं कटवाना चाहेगा।
एक एकड़ में जितना गेहूं होता है, उतना ही तूड़ा होता है। जैसे एक एकड़ में 15-20 क्विंटल गेहूं मिलता है तो पशु चारा भी लगभग उतना ही मिल जाता है। अगर कंबाइन से गेहूं कटता है तो महज दो तीन क्विंटल पशुचारा मिलता है। यानी गेहूं की पैदावार का पांचवा हिस्सा तूड़े के तौर पर मिलता है।
कहीं से मजदूर का जुगाड़ भी हो जाए, तो कोरोना का खतरा बरकरार है। खेत में कंबाइन से गेहूं कटवा लिया है तो उसे मंडी में ले जाने के लिए ट्रांसपोर्ट और मजदूर चाहिए। ऐसे में हमारी सरकार से मांग है कि वह किसानों के गेहूं की खरीद पर पांच रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बोनस दे, ताकि वह सालभर के लिए पशुचारा खरीद सके।
दूसरा, इस बार कटाई का सीजन आगे जाना तय है, इसलिए सरकार खेतों में ही गेहूं की खरीद सुनिश्चित करे। सभी किसान कंबाइन से गेहूं कटवा सकें, इसके लिए सौ रुपया प्रति क्विंटल की आर्थिक मदद दी जाए। अगर ऐसा हो जाता है तो अन्नदाता कई तरह की मुसीबतों से बच जाएगा।