कोविड-19 के मरीजों के इलाज में जुटे अस्पताल डॉक्टरों, नर्सों और सफाई कर्मचारियों को संक्रमण से बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पीपीई किट, प्रशिक्षण और अतिरिक्त जरूरी कर्मचारियों के कारण अस्पतालों का खर्च प्रति मरीज 25 फीसदी तक बढ़ गया है। उनके पास पीपीई किट पर्याप्त नही हैं। सर्जिकल मास्क की कीमत एक रुपये से बढ़कर 10 रुपये हो गई है।
एन95 मास्क के दाम 5 गुना बढ़कर 200 रुपये और पीपीई किट की कीमत 800 रुपये से बढ़कर 2,500 रुपये हो गई है। लागत घटाने के लिए अस्पताल एन95 मास्क के दोबारा इस्तेमाल के लिए प्लाज्मा मशीनों जैसी तकनीक अपना रहे हैं। डॉक्टर चार दिन तक एक मास्क पहनने को मजबूर हैं। नर्सों को केवल मास्क और दस्ताने मिल रहे हैं, जबकि सफाई कर्मचारी बिना सुरक्षा उपकरण ही काम कर रहे हैं।
...तो 75 फीसदी घट जाएगी कमाई
लॉकडाउन से पहले जिन छोटे अस्पतालों और नर्सिंग होम की कमाई फरवरी में 2.6 करोड़ रुपये तक थी, वह मार्च में घटकर 2.35 करोड़ रह गई। अप्रैल के पहले 10 दिनों में इनकी कमाई महज 23 लाख रुपये रह गई। ऐसे में आशंका है कि फरवरी के मुकाबले इनकी अप्रैल की कमाई घटकर एक चौथाई यानी 75 फीसदी रह जाएगी।
मेडिकल उद्योग के विशेषज्ञों की मानें तो यह संकट हेल्थकेयर पेशेवरों की आजीविका को भी नुकसान पहुंचा रहा है। जो अस्पताल सीजीएचएस और ईसीएचएस योजनाओं के तहत इलाज करते हैं, उनके लिए थोड़ी राहत है।
सरकार इन योजनाओं के तहत इलाज पर निजी अस्पतालों को करीब 2,000 करोड़ रुपये (26.4 करोड़ डॉलर) का भुगतान करती है। मौजूदा समय में यह रकम अस्पतालों के लिए जीवनदायिनी साबित हो सकती है। लेकिन, भुगतान नहीं होने पर अस्पताल भी महामारी की चपेट में आकर खत्म हो जाएंगे।
अब सरकार का ही भरोसा
निजी अस्पताल चलाने वाले डॉक्टरों का कहना है कि सरकारी योजनाओं के तहत इलाज पर ही उनके अस्पताल चल रहे हैं। मरीजों की संख्या 80 फीसदी से घटकर 20 फीसदी रह गई है। ईएनटी (आंख-कान-नाक) विभाग भी खाली है। इस दौरान केवल गर्भवती महिलाएं और हार्ट अटैक वाले मरीज ही आ रहे हैं।
इससे वित्तीय संकट पैदा हो गया है। ऐसे में अब सरकार का ही सहारा है। इन योजनाओं के तहत इलाज के पैसे मिलने पर ही अस्पताल चलाना संभव हो सकेगा। जिन अस्पतालों में ये सुविधाएं नहीं हैं, वे अधिकतम तीन महीने तक ही अपनी गाड़ी खींच पाएंगे।