दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसे बड़ी लापरवाही बताया है। केजरीवाल ने कहा कि मरकज में शामिल हुए 441 लोगों के संक्रमित होने की संभावना है। खबर आ रही है कि कुछ लोगों की कोरोना संक्रमण से मौत हो गई है, फिर भी मुख्यमंत्री की तरह लापरवाही का पूरा ठीकरा जमात पर फोड़ देना तथ्यपरक नहीं है।
निजामुद्दीन के पास तब्लीगी समाज के मरकज में इतने लोग हों और दिल्ली सरकार को पता न हो? यह अपने आप में बड़ा सवाल है। वैसे जब भी ऐसा आयोजन होता है, इसका प्रचार प्रसार होता है। इतना ही नहीं मरकज में शामिल होने इतने लोगों के आने की जानकारी स्थानीय प्रसाशन को न होना भी हास्यापद ही है।
पूर्व आव्रजन अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि क्या अधिकारी, केंद्र सरकार और एजेंसियां कान में तेल डालकर सो रही थीं? सूत्र का कहना है कि 300 विदेशी के आने की बात कही जा रही है। इसमें इंडोनेशिया, मलयेशिया के भी नागरिक हैं। जो लोग आए हैं, जाहिर है वीजा लेकर आए होंगे।
वीजा मिलने का भी एक कारण होता है। आने वाले लोगों में एक बड़ी तादाद में हवाई सफर किया होगा। इतना ही नहीं तब्लीगी समाज के मरकज को लेकर भी कुछ औपचारिकताएं हुई होंगी। वैसे भी यह मरकज 16-23 मार्च 2020 तक चला है।
सूत्र का कहना है कि डब्ल्यूएचओ के नई दिल्ली स्थिति कार्यालय या जिस किसी की भी पहल पर तब्लीगी समाज के लोगों को निकाला गया, यह अपने आप में कई सवाल खड़ा कर रहा है। यह बताता है कि हम कितने सावधान रहते हैं।
पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि हमारे यहां लोग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालने में लगे रहते हैं। यही मामला यहां भी है। पूर्व विदेश सचिव का कहना है कि हालांकि तब्लीगी समाज के लोगों को जमीयते इस्लामी मुसलमान नहीं मानती। हमारे यहां भी तब्लीगी समाज के लोगों को वीजा नहीं दिया जाता।
ये पर्यटक वीजा पर पहले ही आ जाते हैं, लेकिन हम यह कहकर पीछा नहीं छुड़ा सकते कि पूरी लापरवाही तब्लीगी समाज के लोगों की ही है। आखिर अफसर, लोग, स्थानीय प्रशासन क्या कर रहा था। शशांक का कहना है कि 18 तारीख को दिल्ली में एक स्थान पर 50 लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी लगा दी गई।
20 मार्च को नियम और सख्त किए गए। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगा था। 23 मार्च को एक स्थान पर पांच लोगों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगा था, फिर इतने लोग एक साथ कैसे थे। यह तो सवाल है ही।