पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने कोविड-19 संक्रमण से निबटने के लिए केंद्र सरकार के राहत पैकेज की दूसरे दिन की घोषणा पर भी सवाल उठाया है। यशवंत सिन्हा ने कहा कि यह पूरा मामला महाभारत के 'अश्वत्थामा मरो, नरो वा कुंजरो' जैसा ही है।
प्रधानमंत्री ने भी 20 लाख करोड़ (जीडीपी का 10 फीसदी) के पैकेज की घोषणा करते समय इसमें आरबीआई और पुरानी घोषणाओं को भी धीरे से कहकर जोड़ लिया है। अब केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण किसी तरह से सभी छोटे-मोटे आंकड़ों को जोड़कर इसे 20 लाख करोड़ तक पहुंचाने में लगी हैं।
सरकार आज भी अपने जेब से क्या दे रही है जानिए
यशवंत सिन्हा के अनुसार केंद्र सरकार ने सभी गरीबों, मजदूरों को अनाज, खाना देने की घोषणा की है। यह अच्छी बात है कि बिना राशन कार्ड वालों को भी सरकार अनाज देगी। यह खर्च केंद्र सरकार के बजट से खर्च होगा।
लेकिन इसके आगे क्या? केंद्र सरकार ने मनरेगा का बजट तो बढ़ाया नहीं है। जब तक मनरेगा का बजट नहीं बढ़ेगा, गांव पहुंच रहे मजदूरों को काम कैसे मिल पाएगा?
यदि केंद्र सरकार मनरेगा का बजट बढ़ाती है, तो यहां केंद्र सरकार पर कुछ भार पड़ता। केंद्र सरकार ने राज्यों को अभी आर्थिक राहत देने की घोषणा नहीं की है। इससे बच रही है। यदि सरकार यह घोषणा करती है तो उसके बजट से पैसा जाएगा।
किसानों को कर्ज से लेकर सब कुछ नाबार्ड, बैंक और संस्थाएं करेंगी?
पूर्व वित्त मंत्री ने कहा कि किसानों को कर्ज से लेकर सबकुछ नाबार्ड, बैंक और संस्थाओं के जरिए होगा। यशवंत सिन्हा का कहना है कि यह सब तो लोन है। इसमें सरकार के बजट से क्या जाना है?
सिन्हा का कहना है कि सबसे बड़ी चिंता एमएसएमई क्षेत्र में लोगों की नौकरियां जा रही है। लोगों को दो महीने से तनख्वाह नहीं मिल रही है और सरकार लोन लेने का पन्ने खोल रही है।
51 दिन बाद आई मजदूरों की याद
लॉकडाउन के 51 दिन बाद केंद्र सरकार को सड़क, हाईवे पर जा रहे गरीब, मजदूरों की याद आई है। अब सरकार उनकी सुध लेने की बात कर रही है।
लेकिन चाहती तो पहले भी गरीब-मजदूरों को परिवहन की सुविधा देकर सुरक्षित तरीके से घर पहुंचाया जा सकता था। मुझे ऐसा लग रहा है कि जैसे केंद्र सरकार संवेदनहीन हो चुकी है। जिसके पास आगे का कोई दृष्टिकोण नहीं है।