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महामारी ने दिखाया आईना...साफ हवा होती तो बच जाती कोरोना वायरस से 15% लोगों की जान

Fri, 05 Jun 2020 02:35 PM IST
अंशुल तलमले न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कोरोना और वायु प्रदूषण के बीच संबंध पर हुए अध्ययन में खुलासा...हवा में पीएम 2.5 की अधिकता से हुई ज्यादा मौतें...भारत में दिल्ली, मुंबई जैसे शहर में बताया बड़ा खतरा
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लॉकडाउन के दौरान इटली के मिलान में स्थित मशहूर कथिड्रेल - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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अगर दुनिया भर में वायु प्रदूषण कम होता है तो कोरोना महामारी से 15 फीसदी लोगों की जान बच सकती थी। कोरोना और वायु प्रदूषण के बीच संबंध को लेकर किए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। कोरोना फैलने से पहले जिन इलाकों में वायु प्रदूषण अधिक था। वहां शोधकर्ताओं को संक्रमित के मरने के मामले ज्यादा मिले। अध्ययन में दावा किया गया है कि हवा साफ होने की स्थिति में अकेले मैनहटन में ही 250 लोग कम मरते। वहीं इटली के उत्तरी भाग में हुई अधिक मौत की वजह भी वायु प्रदूषण बताई गई है। इस शोध ने दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों को लेकर भी चिंता जताई थी।

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हवा में पीएम 2.5 की अधिकता से हुई मौतें

यह शोध अमेरिका की 3,080 काउंटिंग में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा किया गया था। इसके लिए पिछले 17 साल के पार्टिकुलेट मैटर का डाटा और वहां कोरोना से मरने वालों की संख्या जुटाई गई थी। इसके नतीजों में शोधकर्ताओं ने पाया कि मृत्यु दर में बढ़ोतरी की वजह हवा में छोटे खतरनाक कौन पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 2.5 की मौजूदगी बताई है।

दिल्ली-मुंबई के हालात खराब

दिल्ली में लॉकडाउन के दौरान ली गई महात्मा गांधी की दांडी मार्च यात्रा की प्रतिमा - फोटो : पीटीआई
लाइफ एंड ब्रेथ इन द एज ऑफ एयर पॉल्यूशन की लेखिका बेथ गार्डिनेर का कहना है कि इस अध्ययन ने भारत जैसे अधिक प्रदूषित देश को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं। खासतौर पर दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों को लेकर चिंता जताई गई है। गार्डिनेर का मानना है कि प्रदूषित हवा वाले अधिकांश देशों ने खराब होते जन स्वास्थ्य पर बहुत ध्यान केंद्रित नहीं किया है। इसकी कीमत कोरोना वायरस चुकानी पड़ सकती है।

हवा साफ होती तो मैनहटन में 248 लोग कम मरते

शोधकर्ताओं ने न्यूयॉर्क के मैनहटन का उदाहरण देते हुए समझाया है कि अगर यहां 20 वर्षों में पीएम का स्तर 1 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर कर लिया जाता तो कोरोना से 248 मौतें कम होती। यानी लंबे समय तक प्रदूषित वायु के संपर्क में रहने वालों पर कोरोना से जान जाने का खतरा ज्यादा रहता है। शोधकर्ताओं ने धूम्रपान को भी एक अन्य कारक के तौर पर शामिल किया है। स्वच्छ हवा वाले इलाके में रहने वाले ज्यादा सुरक्षित शोधकर्ताओं के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति अधिक पीएम वाले इलाके में 10 को से रह रहा है तो उसके संक्रमण से मरने की आशंका 15% ज्यादा है। वहीं स्वच्छ वायु वाले इलाके का व्यक्ति तुलनात्मक रूप से सुरक्षित है।
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जो हम वर्षों में नहीं कर पाए कोरोना वायरस ने चंद दिनों में कर दिया

कोरोना वायरस और पर्यावरण - फोटो : ट्विटर
कोरोना कॉल ने दुनिया के बड़े छोटे शहरों में हमें कुदरत के मूल स्वरूप से भी परिचित कराया है। विकसित हो या विकासशील सभी देशों में न सिर्फ हवा पानी का साफ हुआ बल्कि वन्यजीव भी बाहर दिखने लगे।
  • न्यूयॉर्क में पिछले साल की तुलना प्रदूषण 50% तक कम हो गया लॉकडाउन के दौरान अमेरिका में 15 साल बाद इतना साफ आसमान दिखाई दिया।
     
  • चीन के 6 बड़े पावर हाउस में 2019 के अंतिम महीनों से ही कोयले के इस्तेमाल में 40 फीसदी गिरावट दर्ज हुई है। वहीं पिछले साल इन्हीं दिनों की तुलना में चीन के 337 शहरों की हवा की गुणवत्ता में 11.4 फीस दी सुधार आया है।
     
  • यूरोप की सेटेलाइट तस्वीरें बताती हैं कि उत्तरी इटली से नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम हुआ है। ब्रिटेन और स्पेन की भी कुछ ऐसी ही कहानी रही है।
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