राज्यसभा में संविधान की प्रतियों को लेकर उठे एक मुद्दे पर बोलते हुए राज्यसभा अध्यक्ष जगदीप धनखड़ ने कहा, 'संविधान की जो मूल प्रति है, जिस प्रति पर संविधान के निर्माताओं ने दस्तखत किए हैं, उसका अभिन्न अंग हैं 22 कृतियां जो भारत की सांस्कृतिक यात्रा के 5000 साल दर्शाती हैं। आज के दिन कोई भी संविधान की पुस्तक लेता है, उसमें ये नहीं है, यह अनुचित है।'
राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने मंगलवार को कहा कि संविधान निर्माताओं की तरफ से हस्ताक्षरित 22 लघु प्रतियां ही एकमात्र प्रामाणिक प्रति है और इसमें केवल संसद की तरफ से संशोधन शामिल हो सकते हैं, और इसे देश में लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी उल्लंघन को सरकार की तरफ से गंभीरता से लिया जाना चाहिए और कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
विज्ञापन
राज्यसभा अध्यक्ष ने सदन के नेता से की अपील
'मुझे कोई संदेह नहीं है और मैं स्पष्ट रूप से कहता हूं कि संविधान के संस्थापकों की तरफ से हस्ताक्षरित 22 लघु प्रतियां ही एकमात्र प्रामाणिक संविधान है और इसमें संसद की तरफ से संशोधन शामिल हो सकते हैं। यदि न्यायपालिका या किसी भी संस्था की तरफ से कोई परिवर्तन किया जाता है, तो यह इस सदन को स्वीकार्य नहीं है। 'मैं सदन के नेता से अपील करूंगा कि वे यह सुनिश्चित करें कि देश में भारतीय संविधान का केवल प्रामाणिक संस्करण ही लागू किया जाए।
शून्यकाल के दौरान राधा मोहन दास अग्रवाल ने उठाया मुद्दा
सभापति सदन में शून्यकाल के दौरान भाजपा सांसद राधा मोहन दास अग्रवाल की तरफ से उठाए गए मुद्दे का जवाब देते हुए कहा कि आज देश में बिकने वाली संविधान की अधिकांश प्रतियों में 22 चित्र गायब हैं। इस दौरान विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने एक मुद्दा उठाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें आगे बोलने की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा बीआर आंबेडकर को बदनाम करने के लिए विवाद पैदा करने के लिए अनावश्यक रूप से इस मुद्दे को उठा रही है। बाद में, कांग्रेस सदस्यों ने सदन से वॉकआउट किया।
विज्ञापन
कांग्रेस के वॉकआउट पर जेपी नड्डा ने जताया आश्चर्य
इस पर सदन के नेता जेपी नड्डा ने आश्चर्य जताया कि इस मुद्दे पर कांग्रेस को क्या आपत्ति है और उन्हें इसका समर्थन करना चाहिए था। उन्होंने कहा, 'यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस नेता आंबेडकर को बदनाम करने का आरोप लगाकर इस मुद्दे को राजनीतिक बनाकर इसका फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं और इसे हटाया जाना चाहिए।' उन्होंने कहा कि प्रकाशकों को संविधान निर्माताओं की भावना को ध्यान में रखते हुए संविधान प्रकाशित करना चाहिए। जेपी नड्डा ने कहा कि प्रकाशकों की तरफ से प्रकाशित संविधान की प्रतियों में चित्र नहीं हैं। उन्होंने आगे कहा कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि प्रकाशक संविधान की भावना को दर्शाने वाली प्रतियां प्रकाशित करें और केवल वही बाजार में उपलब्ध हों।