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Woman: महिलाओं को घर का मालिक बना रहा सहकारी संघ, आर्थिक तरक्की से बदल रहा जीवन

सार

दुग्ध सहकारी संघों ने बनासकांठा की पहचान बदल दी है। अब यह एशिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक क्षेत्रों में से एक के तौर पर देखा जाता है। बनासकांठा अब युवाओं के पलायन के लिए नहीं, दुग्ध उत्पादन के लिए जाना जाता है।
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दुग्ध उत्पादन से परिवार की जिंदगी बदल रही महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बनासकांठा जिला कभी गुजरात के सबसे पिछड़े जिलों में गिना जाता था। पिछड़ी कृषि और रोजगार के किसी अन्य साधनों की उपलब्धता न होने के कारण यहां के युवा भी दूसरे शहरों में जाकर नौकरियों की तलाश करते थे। बनासकांठा को भी गुजरात में यूपी-बिहार की तरह 'लेबर फैक्ट्री' की तरह से देखा जाता था। लेकिन दुग्ध सहकारी संघों ने बनासकांठा की पहचान बदल दी है। अब यह एशिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक क्षेत्रों में से एक के तौर पर देखा जाता है। बनासकांठा अब युवाओं के पलायन के लिए नहीं, दुग्ध उत्पादन के लिए जाना जाता है।

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सहकारी संघों के माध्यम से होने वाला यह व्यापार लगभग पूरी तरह महिलाओं के द्वारा संचालित किया जाता है। घर की महिलाएं कृषि में पुरुषों का साथ देने के साथ-साथ गाय-भैंसों का पालन करती हैं और दूध बेचकर पैसे कमाती हैं। बनास डेयरी जैसे सहकारी संघों से जुड़कर केवल दूध बिक्री के जरिए हर महीने कुछ हजार से लेकर लाखों-करोड़ों की कमाई करती हैं। 

एक दुग्ध उत्पादक महिला ने अमर उजाला को बताया कि वे एमए. बीएड हैं, लेकिन विवाह के बाद उन्होंने नौकरी करने की बजाय दुग्ध उत्पादन का व्यवसाय अपनाना ज्यादा बेहतर समझा। इस व्यवसाय में वे स्वयं की मालिक हैं और किसी भी तरह के तनाव से मुक्त रहती हैं। जहां तक कमाई की बात है, केवल दुग्ध उत्पादन से वे हर वर्ष 30 से 35 लाख रूपये तक की कमाई करती हैं। 
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दुग्ध उत्पादन से परिवार की जिंदगी बदल रही महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला
ऊंची नौकरियों को दे रही मात
बनासकांठा के एक गांव की महिला ने बताया कि उनके पास सौ गाय और कुछ भैंसे हैं। इनके पालन में वे चार अन्य परिवारों का सहयोग लेती हैं, लेकिन केवल दुग्ध उत्पादन से वे हर साल एक करोड़ रूपये से अधिक की कमाई करती हैं। अब तक यह कमाई बड़े-बड़े व्यवसायों या बहुराष्ट्रीय कंपनियों में उच्च पदों पर नौकरी करने से ही संभव है। लेकिन उनके जैसी महिला के लिए यह एक सपना भर था। लेकिन दुग्ध उत्पादन ने उनके लिए भी यह अवसर उपलब्ध करा दिया है जिसमें वे बिना कोई विशेष दक्षता हासिल किए भी करोड़ों रुपयों की कमाई कर रही हैं। उनके जैसी अनेक महिलाएं हैं जो दुग्ध उत्पादन के जरिए हर वर्ष करोड़ों रूपयों की कमाई कर रही हैं। वे दूध बेचकर ही अपने लिए आलीशान घर, बड़ी गाड़ियां और अन्य सुख-सुविधाएं जुटा रही हैं। 

परिवार में बढ़ा सम्मान
पारंपरिक भारतीय परिवारों में आर्थिक-सामाजिक निर्णय लेने की पूरी क्षमता पुरुषों के हाथों में केंद्रित रहती है। लेकिन परिवार की आर्थिक कमाई में सबसे बड़ी हिस्सेदार बन रही महिलाएं अब सामाजिक बदलाव की नई गाथा लिख रही हैं। अब ये महिलाएं परिवार के निर्णयों में ज्यादा प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। एक महिला ने अपना अनुभव बताया। उन्होंने कहा, कमाऊ पूत सबको प्यारा होता है। अब महिलाएं परिवार की 'कमाऊ पूत' बन रही हैं। परिवार में अब उनके लिए ज्यादा सम्मान और अधिकार है।  

 
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दुग्ध उत्पादन से परिवार की जिंदगी बदल रही महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला
कमाई में 18:82 का अनुपात
बनास डेयरी के मैनेजिंग डायरेक्टर संग्राम आर. चौधरी ने अमर उजाला को बताया कि सहकारी संघों का मॉडल निजी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तरह कमाई करने पर केंद्रित नहीं है। यह कमाई का केवल 18 प्रतिशत हिस्सा कार्य संचालन के लिए अपने पास रखता है, जबकि दुग्ध उत्पादन से आने वाले पैसे का 82 फीसदी किसानों को देता है। केवल बोनस में हर साल किसानों को करोड़ों रुपयों की राशि बांटी जाती है। यही कारण है कि उनके जैसे सहकारी दुग्ध संघ गुजरात के किसानों की आर्थिक तरक्की का कारण बन गए हैं।

पशुपालन बड़ा आधार क्यों बना
बनास डेयरी के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर ब्रिगेडियर विनोद बाजिया (रिटायर्ड) ने बताया कि प्राकृतिक कारणों से बनासकांठा जैसे इलाकों में कृषि बहुत विकसित नहीं हुई। लिहाजा यहां के लोगों के लिए पशुपालन ज्यादा आकर्षक व्यवसाय बन गया। जब तक सहकारी संघों की दखल नहीं थी, किसानों की कमाई बिचौलिये ले जाते थे, लेकिन बनास डेयरी ने किसानों के उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराए हैं जिससे इनकी कमाई में शानदार बढ़ोतरी हुई है। यह कमाई अब पूरे इलाके में बदलाव के तौर पर दिखाई दे रही है।    
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