70 साल के दौरान संविधान में कुल 103 संशोधन हुए हैं। पहला संशोधन 1951 में अस्थायी संसद ने पारित किया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब तक केवल 99वें संशोधन को असांविधानिक करार दिया है। यह राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन से संबंधित था।
संविधान निर्माण के दौरान संविधान सभा के सदस्यों का स्पष्ट मत था कि संविधान को बदलते समय और परिवेश के अनुरूप बदलना चाहिए, लेकिन उनका यह भी मत था कि बदलाव की प्रक्रिया इतनी लचीली हो कि आसानी से संशोधन किया जा सके। भारत के संविधान के अनुच्छेद 368 में संविधान संशोधन की प्रक्रिया का प्रावधान है।
कई संवैधानिक प्रावधानों को संसद में सामान्य बहुमत के द्वारा संशोधित किया जा सकता है। इसमें नागरिकता, नए राज्यों का गठन, संसद में कोरम, पांचवें और छठे शेड्यूल में शामिल तथा अन्य प्रावधान शामिल हैं। इसकी आर्टिकल 368 में अलग से चर्चा नहीं है।
संसद में विशेष बहुमत का मतलब है दोनो सदनों के दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन। इसमें राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग, देश में आपातकाल की घोषणा आदि से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
राष्ट्रपति का चुनाव, केंद्र और राज्यों के अधिकार, संविधान में संशोदन आदि से संबंधित प्रावधानों में बदलाव के लिए संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत के साथ कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों का अनुमोदन भी अनिवार्य है।
संविधान में संशोधन से संबंधित बिल संसद के किसी भी सदन में पेश किए जा सकते हैं। इसे दोनों सदनों में सदस्यों के बहुमत और वोटिंग के दौरान मौजूद सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पास होने के बाद राष्ट्रपति के पास अनुमोदन के लिए भेजा जाता है। राष्ट्रपति की संस्तुतिु मिलने के बाद ही विधेयक कानून बनता है।