प्राप्त जानकारी के अनुसार रविवार को सीडब्ल्यूसी की बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष ने बहुत संतुलित रुख अपनाया। पार्टी के फोरम पर आनंद शर्मा, गुलाम नबी आजाद सरीखे नेता भी बहुत हो-हल्ला के मूड में नहीं थे। सभी की चिंता का मुख्य बिंदु राजनीतिक ट्रैक से उतर रही पार्टी को उसका मान-सम्मान दिलाना ही रहा। वरिष्ठ नेताओं में से कुछ को उम्मीद है कि आने वाले समय में इसका कुछ असर दिखेगा। हालांकि एक पूर्व केंद्रीय मंत्री का कहना है कि यह कांग्रेस है। यहां अंगीठी पर चाय 2022 में रखी जाती है तो पककर 2024 तक तैयार होती है। तब तक मुझे नहीं पता कि लोगों में चाय पीने की तलब कितनी बनी रहती है।
'आपसी घमासान न हो तो कांग्रेस कोई चुनाव न हारे'
राहुल गांधी के सचिवालय के सदस्य कहते हैं, वह 2015 से देख रहे हैं। राहुल गांधी हर चुनाव के पहले कांग्रेस के नेताओं में आपसी तालमेल के लिए पूरा जोर लगा देते हैं, लेकिन एन वक्त पर हर बार बात बिगड़ जाती है। इसका पार्टी को बड़े पैमाने पर नुकसान उठाना पड़ रहा है। सूत्र का कहना है कि चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी पंजाब में कांग्रेस नेताओं के कई गुट थे। आज हारने के बाद भी वही स्थिति बनी हुई है। पंजाब के पूर्व प्रधान सुनील जाखड़, मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नेता एक दूसरे को देखना पसंद नहीं करते। सोमवार को सुनील जाखड़ का ही चन्नी को लेकर दिया गया बयान ले लीजिए। सांसद रवनीत सिंह बिट्टू, पूर्व मंत्री बलबीर सिंह सिद्धू के बयान भी कम नहीं हैं।
कांग्रेस के आईटी सेल से जुड़े नेता का कहना है कि अब ऐसे में चाहे राहुल गांधी हों या फिर प्रियंका या सोनिया गांधी? कोई क्या कर लेगा? अजय माकन ने रविवार की बैठक में कई सवाल उठाए थे। कांग्रेस सूत्र बताते हैं कि सोनिया गांधी ने इन सवालों के जवाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को लेकर लिए गए निर्णय की काफी बड़ी जिम्मेदारी अपने ऊपर डाल ली। उन्होंने कहा कि उन्होंने कैप्टन का काफी समय तक बचाव किया था। अब कांग्रेस अध्यक्ष के इस निर्णय पर भी पार्टी के नेता सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि तब छह महीने और कैप्टन को बने रहने देना था? चुनाव बाद देखा जाता।
सवाल सिद्धू-चन्नी पर ही नहीं हरीश रावत और संदीप सिंह पर भी
संदीप सिंह कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा से सीधे जुड़े हैं। उत्तर प्रदेश के तमाम कांग्रेसी नेताओं का कहना है कि संदीप सिंह के कारण राज्य में पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। यह शिकायत राहुल गांधी के दफ्तर तक भी पहुंच रही है। इसी तरह से उत्तराखंड में चुनाव के ऐन वक्त पर हरीश रावत की भूमिका को लेकर भी पहाड़ के नेताओं ने दिल्ली तक नाराजगी पहुंचानी शुरू की है। नवजोत सिंह सिद्धू और चन्नी की तरह ही उत्तराखंड के कद्दावर नेता, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अपनी सीट से चुनाव हार गए हैं। भाजपा को छोड़कर कांग्रेस में आए हरक सिंह रावत के शुभचिंतकों ने भी इसे तेजी से मुद्दा बनाना शुरू किया है। पार्टी के एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी कांग्रेस अध्यक्ष को चिट्ठी लिखने की तैयारी कर रहे हैं। अमर उजाला से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि कहां हमें 40-42 सीटें मिलने का पूरा भरोसा था और कहां पार्टी 18 सीटों पर सिमट पर गई। इसकी समीक्षा होनी चाहिए और जिम्मेदारी भी तय करनी चाहिए। एक अन्य वरिष्ठ नेता ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कोई कड़ा फैसला नहीं लेंगी, तो पार्टी का भला होना मुश्किल है।
'सवाल उठाने से अच्छा है लोग प्रचार में आगे आएं, कुछ करें'
एसवी रमणी कांग्रेस के नेता हैं। तमिलनाडु में सक्रिय रहते हैं। उनका कहना है कि पिछले दस साल से कोई भी चुनाव देख लीजिए, राहुल गांधी कड़ी मेहनत करते हैं। इस बार पांच राज्यों के चुनाव में प्रियंका गांधी ने भी बड़ी मेहनत की। लेकिन हमारी पार्टी के नेता इस प्रचार अभियान और पार्टी को आगे बढ़ाने में अपनी ताकत नहीं लगाते। उनके पास सवाल ज्यादा रहता है। रमणी का कहना है कि पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश या फिर गोवा और मणिपुर में आपने कितने केंद्रीय नेताओं को प्रचार करते देखा। क्या केवल तीन ही लोग पार्टी में हैं? इन्ही पर सारा बोझ है? आप कांग्रेस को पिछले दो साल में छोड़कर जाने वाले नेताओं को ही देख लीजिए। आखिर क्यों छोड़कर चले गए? अमेठी के संजय सिंह और जितिन प्रसाद क्यों गए? अब यह सवाल कौन पूछेगा कि कांग्रेस के लिए क्या किया था? कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन में काम करने के बाद बेंगलुरु में सक्रिय वरिष्ठ नेता कहना है कि इधर सवाल उठाने वालों की संख्या बढ़ रही है। जबकि सबको चाहिए एक बार कुछ समय के लिए पार्टी के हित में अपनी पूरी ऊर्जा से काम करें। समय हमेशा एक सा नहीं रहता, बदलता रहता है।