राफेल लड़ाकू विमान सौदे में रिलायंस डिफेंस को लेकर सवाल उठने के बाद दसॉल्ट एविएशन ने सफाई दी। दसॉल्ट एविएशन ने अपनी सफाई में केवल दो बाते कही। पहली तो यह कि रिलायंस डिफेंस का चयन कंपनी के सीईओ एरिक ट्रेपर ने किया था। दूसरा कारण रिलायंस के पास नागपुर एयरपोर्ट के पास जमीन का होना बताया गया। ताकि दसॉल्ट एविएशन के लोग आसानी से आ-जा सकें।
दसॉल्ट के यह दोनों ही कारण हजम होने लायक नहीं है। क्योंकि रिलायंस डिफेंस का पंजीकरण ही इस सौदे के 12 दिन पहले हुआ था और कंपनी के पास रक्षा क्षेत्र में काम करने का कोई अनुभव नहीं है। एक बड़ा सवाल और है कि रक्षा क्षेत्र की 70 से अधिक कंपनियों और 17 बड़ी भारतीय कंपनियों में से रिलायंस डिफेंस को ही क्यों चुना गया?
सरकार के जवाब नहीं दे पा रहे हैं भरोसा
वायुसेना को 42 स्क्वाड्रन की क्षमता पाने के लिए 1998 में ही 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों की जरूरत थी। अटल जी की नेतृत्व वाली सरकार ने इसे महसूस किया था और यूपीए-1 सरकार ने वायुसेना की जरूरत, कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की अनुमति के बाद इसके अंतरराष्ट्रीय प्रस्ताव मंगाए थे। वायुसेना की जरूरत जस की तस बनी है, फिर सरकार ने स्क्वाड्रन राफेल लड़ाकू विमान क्यों लिया।
सरकार का कहना है कि राफेल विमान यूपीए-2 के समय में हुए निगोशियेशन से सस्ता है। यह विश्वस्तरीय उन्नत लड़ाकू विमान है। वायुसेनाध्यक्ष एयरचीफ मार्शन धनोवा इसे गेम चेंजर बताते हैं। फिर सवाल उठता है कि 36 राफेल ही क्यों? रक्षा मंत्रालय ने 36 राफेल विमान सौदे के बाद मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत विदेशी विमान निर्माता कंपनी के सहयोग से देश में 110 सिंगल इंजन वाले लड़ाकू विमान को विकसित करने की प्रक्रिया शुरू की। जबकि वायुसेना एकल इंजन वाले लड़ाकू विमानों को लेने की अनिच्छा जाहिर करती रही?
रक्षा मंत्रालय ने मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत तैयार होने वाले 110 एकल इंजन वाले लड़ाकू विमानों की निविदा को भी रद्द कर दिया और जुलाई 2018 में नए सिरे से बहुउद्देश्यी लड़ाकू विमानों के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रस्ताव मंगाए गए हैं। सबसे बड़ा सवाल- वायुसेना की जरूरत बरकरार है। चीन और पाक सेना पर चुनौती बरकरार है। सरकार खुद कह रही है कि राफेल लड़ाकू विमान यूपीए के समय में हुए सौदे से सस्ता है, तो फिर 36 ही क्यों लिए?
एचएएल (हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड) और रिलायंस डिफेंस की कोई तुलना संभव नहीं है। एचएएल सार्वजनिक क्षेत्र की विमान निर्माता कंपनी है। यह कंपनी सुर्खो-30 एमकेआई को ट्रांसफर ऑफ टेक्नॉलॉजी के तहत देश में बनाती है। एचएएल के इंजीनियर सुखोई की सर्विसिंग करते हैं। मिग सिरीज विमानों के निर्माण और जगुआर विमानों की सर्विसिंग एचएएल ही करती है। देश का पहला एडवांस लाइटवेट हेलीकाप्टर एचएएल ने ही विकसित किया है। देश में ही विकसित लाइट कॉम्बट एयरक्राफ्ट विकसित करने में एचएएल की बड़ी भूमिका है।
इतना ही नहीं रूस के साथ पांचवी पीढ़ी का लड़ाकू विमान संयुक्त रूप से विकसित करने का करार भी एचएएल के साथ ही हुआ था। यूपीए की सरकार ऑफसेट क्लाज के तहत 126 बहुउद्देश्यी लड़ाकू विमान ले रही थी। इनमें से 18(एक स्क्वाड्रान ) तैयार हालत में और 108 फ्रांस की दसॉल्ट कंपनी के सहयोग से एचएएल में बनने थे। इससे सार्वजनिक क्षेत्र की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती और इसके इंजीनियरों, डिजाइनरों को आर्ट ऑफ टेक्नोलॉजी का अनुभव होता।
इसके बरक्स रिलायंस डिफेंस शून्य पर खड़ी है। इसके पास एवियानिक्स, काकपिट टेक्नोलॉजी, डिजाइन, ग्राफिक्स आदि को बेसिक लेवेल पर समझने वाले इंजीनियरों का अभाव है। कंपनी के पास जमीन के सिवा कुछ नहीं है। न तो कोई विमान निर्माण का अनुभव है और न ही रक्षा क्षेत्र का।
अब तक आ चुका होता राफेल
प्रधानमंत्री मोदी सरकार के समय में हुए सौदे के अनुसार राफेल लड़ाकू विमान की पहली खेप 2019 में मिलेगी। 2022 तक भारत को 36 राफेल लड़ाकू विमान मिल पाएंगे। इसके सामानांतर यूपीए सरकार के समय में हो रहे सौदे के अनुसार पहला राफेल लड़ाकू विमान जून 2016 में भारतीय वायुसेना को मिलना था। इस तरह से राफेल लड़ाकू विमान अब तक वायुसेना को अपनी सेवाएं दे रहा होता।