2024 को देख विपक्ष को एकजुट करने की क्षमता
कांग्रेस के चाणक्य कहे जाने वाले अहमद पटेल की खाली जगह को गहलोत भर सकते हैं। अहमद पटेल की पैठ केवल पार्टी ही नहीं, विपक्ष के बाकी नेताओं में भी थी। ठीक इसी तरह अशोक गहलोत के भी कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेताओं के साथ अच्छा तालमेल है। वहीं अन्य दलों के नेताओं के साथ भी उनके अच्छे संबंध हैं। लंबे राजनीतिक अनुभव के कारण भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने की क्षमता भी उनमें नजर आती है। वही, गहलोत को राजस्थान की सियासत का जादूगर कहा जाता है। पेशे से भी वह जादूगर रह चुके हैं। उनकी जादूगरी वोटरों के सिर चढ़कर बोलती है। विरोधी भी उनके अंदाज के कायल हैं। उन्हें दिल जीतने का माहिर कहा जाता है। जब भी आलाकमान मुश्किल में पड़ा है, तब गहलोत ने उसे उबारा है।
...इसलिए थरूर से आगे हैं गहलोत
कांग्रेस सांसद शशि थरूर भी अध्यक्ष पद के लिए नामांकन भरने जा रहे है। थरूर दक्षिण भारत से आते हैं। वे कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों में लोकप्रिय जरूर हैं, लेकिन अनुभव के मामले में गहलोत से बहुत पीछे हैं। गहलोत राजस्थान, दिल्ली, गुजरात, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, पंजाब, उत्तराखंड और मध्यप्रदेश में जाने-पहचाने जाते हैं। हिंदी पट्टी के राज्यों को कवर करने के लिए गहलोत कांग्रेस के लिए हर तरह से ज्यादा मुफीद रहेंगे। थरूर की बात करें, तो अंग्रेजी पर उनकी जबर्दस्त पकड़ है। हिंदी बोलना वे जानते हैं, लेकिन भाषण देने में उन्हें दिक्कत होती है। लेकिन उनके ज्ञान को चैलेंज करना मुश्किल है। हालांकि, अपनी सीमाओं के चलते एक बड़े वर्ग तक थरूर नहीं पहुंच पाते हैं।
अशोक गहलोत की गिनती गांधी परिवार के करीबियों में होती है। गांधी परिवार भी नहीं चाहेगा कि कमान पूरी तरह से स्वतंत्र हाथों में चली जाए। उसमें गहलोत थरूर से ज्यादा फिट बैठते हुए दिखते हैं। क्योंकि गांधी परिवार के लिए थरूर की विश्वसनीयता पर संदेह है, वह कांग्रेस के उन जी-23 नेताओं के ग्रुप में शामिल हैं, जिन्होंने 2020 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिख कर संगठन में बड़े बदलाव की अपील की थी। यही नहीं, पार्टी की दुर्दशा के लिए केंद्रीय नेतृत्व पर सवाल खड़े किए थे।
यह जगजाहिर है कि कांग्रेस पार्टी अंदरूनी कलह की शिकार है। इसी कारण पार्टी ने कई राज्य गंवा दिए हैं। गहलोत के पास लंबा राजनीतिक अनुभव है। वह संगठन को एकजुट कर सकते हैं। इसके चलते कांग्रेस के नेताओं का वह खेमा भी उनकी छतरी के नीचे आ सकता है, जो पार्टी में बदलाव नहीं चाहता है या फिर गांधी परिवार के किसी सदस्य के हाथों में पार्टी की कमान को देखना चाहता है। वहीं, थरूर के हाथों में कांग्रेस गई, तो इस कलह के बढ़ने की आशंका रहेगी। उनका राजनीतिक अनुभव पार्टी के कई नेताओं से कम है। उनके लिए इकाई और संगठन स्तर पर लोगों के साथ संवाद स्थापित करना और उन्हें अपनी राह पर चलना मुश्किल होगा।