मध्यप्रदेश में जारी सियासी संकट और ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे से लगे झटके की वजह से कांग्रेस पार्टी अचानक से अलर्ट मोड में आ गई है। मंगलवार को जहां पूरा देश होली मना रहा था, वहीं मध्यप्रदेश में कई सियासी रंग देखने को मिल रहे थे। ऐसे में सबक लेते हुए कांग्रेस ने बुधवार सुबह ही दिल्ली और कर्नाटक में प्रदेश अध्यक्ष का एलान कर दिया।
खास बात यह है कि कांग्रेस ने जिन दो राज्यों में प्रदेश अध्यक्षों का एलान किया है उन दोनों में ही इस पद के खाली होने के पीछे बड़ा कारण चुनावों में मिली हार रही है। बता दें कि हाल ही में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार के बाद उसके प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद से ही यह पद खाली था। जबकि कर्नाटक में बीते साल दिसंबर में उपचुनाव में मिली हार की जिम्मेदारी लेते हुए दिनेश गुंडुराव ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था।
दिल्ली में अनिल चौधरी पर भरोसा
कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने अनिल चौधरी को दिल्ली प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है। उन्हें पार्टी का पुराना कार्यकर्ता और अपने समाज पर पकड़ रखने वाले मजबूत नेता के तौर पर देखा जाता है। वे कांग्रेस के पूर्व विधायक और पार्षद रहने के साथ-साथ संगठन में कई महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
पार्टी ने अध्यक्ष के साथ पांच उपाध्यक्ष भी नियुक्त किए हैं। इनमें अभिषेक दत्त, जयकिशन, मुदित अग्रवाल, अली हसन और शिवानी चोपड़ा शामिल हैं। नई टीम में जय किशन अनुसूचित वर्ग का तो अली हसन अल्पसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व करेंगे।
वहीं पूर्व दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा की बेटी शिवानी चोपड़ा महिलाओं का प्रतिनिधित्व करेंगी। शेष टीम का एलान जल्दी ही किया जाएगा। पार्टी अध्यक्ष पद के लिए कई चेहरे दौड़ में बताए जा रहे थे, लेकिन अंततः अनिल चौधरी का नाम तय किया गया।
पार्टी के एक नेता के मुताबिक अनिल चौधरी युवा और अनुभवी दोनों हैं। वे पार्टी कार्यकर्ताओं पर भी अच्छी पकड़ रखते हैं। उनके नाम पर कोई विवाद नहीं है और इसलिए पार्टी ने उनका नाम आगे बढ़ाकर भविष्य की ओर देखने की तरफ संकेत दिया है।
कांग्रेस अध्यक्ष अनिल चौधरी के सामने पिछले लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव, दोनों चुनावों में शून्य पर सिमटकर रह गई कांग्रेस को एक बार फिर उसका पुराना गौरव वापस दिलाने की कड़ी चुनौती है। शीला दीक्षित के नेतृत्व में पार्टी लगातार तीन बार दिल्ली की सत्ता पर आसीन रही, लेकिन उसके बाद वापसी के लिए वह संघर्ष कर रही है।