उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव डेढ़ साल दूर हैं, लेकिन यहां के सियासी माहौल में राजनीतिक खुशबू अभी से महसूस की जाने लगी है। सत्ता पर विराजे योगी आदित्यनाथ को एक बार फिर हिंदुत्व कार्ड पर ही भरोसा है, सो राम मंदिर निर्माण को पुरजोर तरीके से प्रचारित करने की कोशिश की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जरिए राम मंदिर की नींव रखवाकर इसे कालजयी घटना बताने की कोशिश अभी से शुरू हो चुकी है।
मगर इसके बाद भी भाजपा के लिए यह अच्छी खबर नहीं है कि हिंदुत्व के झंडाबरदार ब्राह्मण मतदाताओं में उसके लिए एक विशेष प्रकार की नाराजगी देखी जा रही है। यह नाराजगी उसे भाजपा से दूर भी कर सकती है। स्थिति को भांपते हुए कांग्रेस ने अपने इस पुराने कोर वोटर को लुभाने की कोशिश शुरू कर दी है। उत्तर प्रदेश के 17 नए जिलाध्यक्षों में सात ब्राह्मणों को उतारकर पार्टी ने ब्राह्मणों को एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की है।
कांग्रेस ने बुधवार को घोषित सूची में महत्त्वपूर्ण लखनऊ जिले की जिम्मेदारी वेदप्रकाश त्रिपाठी को सौंपी है, तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जिले गोरखपुर सिटी से आशुतोष तिवारी को जिलाध्यक्ष बनाया है। मिर्जापुर से राजन पाठक, सोनभद्र सिटी से राजीव कुमार त्रिपाठी और लखीमपुर सिटी से सिद्धार्थ त्रिवेदी को मौका दिया गया है। जेपी मिश्रा को बहराइच जिले की जिम्मेदारी दी गई है। 15 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाताओं वाले उत्तर प्रदेश में इस बदलाव को एक बड़े सियासी संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
ब्राह्मणों के पास विकल्प नहीं
कांग्रेस की पारंपरिक सीट रही अमेठी के पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष योगेन्द्र मिश्रा का मानना है कि यूपी का ब्राह्मण मतदाता इस समय बेहद क्षुब्ध है। हिंदुत्व के भ्रमजाल में फंसकर वह भाजपा के पास चला तो जरुर गया, लेकिन केंद्र की छह साल की सत्ता और उत्तर प्रदेश की साढ़े तीन साल की सत्ता में उसे केवल उपेक्षा ही मिली है। उन्होंने कहा कि इस समय प्रदेश भर में हो रही ब्राह्मणों की हत्याओं से वह बेहद विचलित है और अपने लिए एक मजबूत विकल्प की तलाश कर रहा है।
अगर पार्टी सही रणनीति के साथ ब्राह्मण चेहरों को सही जिम्मेदारी देकर जमीन पर उतारे तो उसे इसका बड़ा फायदा मिल सकता है। वहीं, पूर्वांचल के वरिष्ठ कांग्रेस कार्यकर्ता चंद्रभूषण तिवारी कहते हैं कि ब्राह्मण के लिए हमेशा राष्ट्रहित सर्वोपरि रहा। उसने देश निर्माण के समय कांग्रेस का साथ दिया तो बाद में सामाजिक उत्थान में अपनी भागीदारी निभाने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ भी गया। मगर उत्तर प्रदेश का पिछले 30 साल का इतिहास बताता है कि उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका के बाद भी किसी भी सरकार में उसे सही भागीदारी नहीं मिली।