कांग्रेस अध्यक्ष ने लगभग एक जैसे मुद्दे तीनों राज्यों में उठाए और तीनों राज्य सरकारों पर भ्रष्टाचार समेत एक जैसे आरोप लगाकर घेरा। फिर भी कांग्रेस मध्य प्रदेश, राजस्थान में भाजपा के खिलाफ लोगों की नाराजगी ठीक से भुना नहीं पाई है। छत्तीसगढ़ की जीत का पूरा क्रेडिट राहुल गांधी के फैसलों को जाता है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में दो-दो क्षत्रप मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदारों के रूप में थे और टिकटों को लेकर भी उनका अपने-अपने तरह से तर्क था। लिहाजा बड़ी संख्या में इन दोनों राज्यें में बागी भी मैदान में उतरे जिन्हें टिकट नहीं मिला वे सपा या बसपा की शरण में चले गए।
छत्तीसगढ़ में चेहरे की लड़ाई न होने के साथ उम्मदीवारी के चयन में पारदर्शिता और जमीनी जुड़ाव फायदेमंद रहा। राहुल गांधी ने वहां रणनीति के तहत सांसद ताम्रध्वज साहू को अंतिम समय में मैदान में उतारा। छत्तीसगढ़ में राहुल ने अपने चार सचिवों पर विश्वास किया और बड़े नेताओं की सूची में जबरदस्त संशोधन भी किया। राहुल एक वरिष्ठ नेता से यहां तक कह दिया था कि आप उम्मीदवारों के वकील नहीं जज की भूमिका में रहे। जबकि मध्यप्रदेश और राजस्थान में राहुल चाहकर भी बड़े क्षत्रपों के दबाव में बदलाव नहीं कर सके। राजस्थान में तो चार सचिवों को उम्मीदवारी के फैसले से अलग राय रखने पर नाराजगी का सामना भी करना पड़ा।
कांग्रेस के सामने इस जीत से अधिक महत्वपूर्ण एक अन्य राज्य मिजोरम का चले जाना है। शायद राहुल जानते थे कि मिजोरम में सरकार ने नहीं बनेगी लिहाजा पांच राज्यों में सबसे कम समय और रणनीति वहीं के लिए बनी। खुद राहुल ने भी दो ही रैलियां की। कांग्रेस के लिए मंथन का विषय है कि आखिर क्या कारण हैं जो राज्य कांग्रेस के पास रहते हैं उनमें वापसी क्यों नहीं हो रही है।