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केरल: वायनाड से राहुल की उम्मीदवारी पर कांग्रेस में उत्साह, भाजपा को बड़ी मदद

Sun, 21 Apr 2019 06:53 AM IST
गौरव द्विवेदी शरद गुप्ता, अमर उजाला, तिरुवनंतपुरम
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वायनाड में राहुल गांधी (फाइल फोटो) - फोटो : Twitter Congress @INCIndia
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वामपंथ का आखिरी किला इस चुनाव में ढह सकता है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में सत्ता खोने के बाद वाम मोर्चे का आखिरी दबदबा अब केरल में रह गया है। लेकिन 23 अप्रैल को होने वाले लोकसभा चुनाव में वह भी समाप्त हो सकता है। आश्चर्यजनक रूप से इसमें बड़ी भूमिका लेफ्ट की परम्परागत प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की नहीं, बल्कि भाजपा की होगी। और भूमिका होगी सबरीमाला मंदिर विवाद की। 

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यही वजह है कि आज देश के सबसे साक्षर प्रदेश में आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर धार्मिक मुद्दा भारी पड़ रहा है। हर जगह लोग सिर्फ सबरीमाला की बात कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने भले ही धार्मिक आधार पर प्रचार पर प्रतिबंध लगाया हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर हर चुनाव क्षेत्र में मुद्दा सबरीमाला है। जबकि केरल न सिर्फ साक्षरता में बल्कि कानून-व्यवस्था से लेकर सामाजिक समता, लिंगानुपात, प्रति व्यक्ति आय जैसे कई मामलों में देश में अव्वल है। 

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने 12 सीटें जीती थीं जबकि वाम मोर्चे यानी एलडीएफ ने 8, लेकिन असली कहानी तो भाजपा की थी। राज्य की 20 सीटों में से वह एक पर दूसरे नंबर पर रही और 17 अन्य पर तीसरे नंबर पर। मोदी लहर पर सवार होकर तिरुवनंतपुरम से भाजपा उम्मीदवार ओ राजगोपाल कांग्रेस के कद्दावर नेता शशि थरूर से केवल 15400 वोटों से हार गए थे। पार्टी को कुल 10.33% वोट मिले थे। 

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विस चुनाव में भाजपा को मिले थे 15% वोट

तीन साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में केरल में वाम मोर्चे ने जीत दर्ज कर सरकार बनाई थी। 140 सीटों वाली विधानसभा में उसके 91 सदस्य जीते थे। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ़ को 45 सीटें मिली थीं। 2011 के चुनाव में यूडीएफ को 72 और एलडीएफ को 68 सीटें मिली थीं लेकिन बड़ी खबर भाजपा का पहली बार एक सीट जीतना रहा था। पार्टी के वयोवृद्ध नेता ओ राजगोपाल ने तिरुवनंतपुरम की नेमन सीट पर जीत कर ‘भगवान का अपना देश’ माने जाने वाले केरल में पार्टी का खाता खोला। छह सीटों पर भाजपा  उम्मीदवार दूसरे नंबर पर आए।  यही वजह है कि इस बार भाजपा को केरल में लोकसभा सीटें जीतने की आशा बंधी है।

लेफ्ट की हताशा 

पिछली लोकसभा में वामदलों के केवल 11 सदस्य थे, जबकि 2004 में उसके 61 सांसद जीते थे। अमेरिका से नागरिक परमाणु समझौते पर उसने मनमोहन सरकार से समर्थन वापस लिया था। इसके बाद से उनके अस्तित्व पर संकट है। बंगाल में 34 साल शासन करने वाला वाम मोर्चा अब आखिरी सांसें ले रहा है। दो वर्ष पहले तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने लगातार दूसरी बार विधानसभा चुनाव जीता तो हाल ही में हुए पंचायत चुनाव में लेफ्ट फ्रंट को पीछे छोड़ते हुए भाजपा अब मुख्य विपक्षी दल बन गई है। राज्य की 42 लोकसभा सीटों में से माकपा केवल दो सीटों पर मुकाबले में है। वहीं पिछले साल हुए त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में माकपा की भाजपा के हाथों करारी हार हुई। इसलिए उनकी उम्मीद की आखिरी किरण केरल ही है। 

मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के लिए सीएम ने झोंकी मशीनरी

राज्य की 20 लोकसभा सीटों में से कम से कम चार पर भाजपा लड़ाई में है। वहीं वाम दलों ने विधानसभा सीटों में पाई लोकप्रियता बहुत तेजी से गंवाई है। दोनों बातों के पीछे वजह एक ही है - सबरीमाला मंदिर में 15 से 45 वर्ष उम्र की महिलाओं के प्रवेश को लेकर उठा विवाद। पिछले साल सितंबर में एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं का प्रवेश वैध ठहराया। इसी के बाद मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने महिलाओं को प्रवेश कराने के लिए हरसंभव कोशिश की और इसके लिए सरकारी मशीनरी का भी प्रयोग किया। वहीं, भाजपा ने परंपराओं की दुहाई देकर इस फैसले के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया। राज्य पार्टी अध्यक्ष पी श्रीधरन पिल्लई द्वारा सबरीमाला को भाजपा के लिए सुनहरा मौका करार देने के लिए मुकदमा दर्ज किया गया था। लेकिन वे अब भी अपनी बात पर अड़े हैं। जबकि कांग्रेस ने होशियारी दिखाते हुए रुख नरम ही रखा। पहले तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने की बात की और फिर प्रवेश के खिलाफ माहौल बनते देख रुख बदल लिया। 


45% ईसाई, मुस्लिम पर थी वाम मोर्चे की निगाह

सबरीमाला पर विजयन के सख्त रुख की वजह सियासी भी थी। उनके सहयोगियों का मानना था कि इस तरह वे राज्य के 18 प्रतिशत ईसाई और 27 प्रतिशत मुसलमानों की हमदर्दी हासिल कर लेंगे। साथ ही उदारवादी हिंदू जो माकपा का काडर हैं, वे उन्हें वोट देंगे ही। इस तरह उन्हें लगा कि उनके पास चुनाव जीतने का फॉर्मूला आ गया है। इसीलिए अदालत के आदेश का पालन कराने में विजयन ने जरूरत से ज्यादा सख्ती बरती। 

संघ की शाखाएं एक साल में ज्यादा बढ़ीं 

केरल की गिनती देश के उन हिस्सों में होती है जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सबसे ज्यादा मज़बूत है। तीन करोड़ की जनसंख्या वाले प्रदेश में संघ की 6845 शाखाओं में चार लाख सक्रिय सदस्य हैं। एक वर्ष के दौरान संघ की सदस्य संख्या तेजी से बढ़ी है। संघ के प्रांत प्रचारक पी गोपालनकुट्टी के अनुसार इस दौरान संघ की शाखाएं और सदस्यता दोनों आठ प्रतिशत की दर से बढ़ी हैं। इतने वर्षों में भाजपा केरल में बहुत कमज़ोर थी। संघ और अल्पसंख्यक कट्टरपंथियों में हिंसक संघर्ष होता था। लेकिन भाजपा की अनुपस्थिति में संघ काडर यहां कांग्रेस का समर्थन करता था। लेकिन अब न सिर्फ संघ बल्कि भाजपा भी केरल में मज़बूत हो रही है। जाहिर है इसका चुनावी लाभ भी मिलेगा।

विकास के मुद्दे पर कांग्रेस की आस

राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव लड़ने से केरल कांग्रेस के नेताओं में जोश आ गया है। वाम दलों और भाजपा के बीच छिड़ी लड़ाई के बीच कांग्रेस को लगता है कि लोग उसके उदारवादी चेहरे को पसंद करेंगे। इसीलिए राज्य कांग्रेस ने लक्ष्य का नाम रखा है -मिशन 20—20, यानी राज्य की बीसों लोकसभा सीटें जीतना। यूडीएफ नेताओं का कहना है कि वे न तो सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में हैं और न ही खिलाफ। वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने के पक्ष में तो हैं लेकिन एक बड़े समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करके नहीं। इसीलिए इस मामले पर चुप हैं। कांग्रेस का कहना है कि उसके लिए विकास के बहुत से मुद्दे हैं जिनकी अनदेखी वाम सरकार कर रही है। 


किसके कितने सांसद

कांग्रेस 8
सीपीएम 5
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग  2
केरल कांग्रेस (एम)  1
सीपीआई  1
क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी  1
निर्दलीय  2
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